Friday, October 31, 2008

लाख हों आंखों में आंसू, मुस्कुराते हैं वो लोग

लाख हों आंखों में आंसू, मुस्कुराते हैं वो लोग.
दूसरों के सामने यूँ गम छुपाते हैं वो लोग.
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जान देकर जो बचाते थे वतन की आबरू,
आपको, हमको, सभी को याद आते हैं वो लोग.
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अपनी ज़ाती सोच से बाहर निकल कर देखिये,
आप ही की तर्ह कुछ सपने सजाते हैं वो लोग.
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आसमानों की छतों के साये में रहते हुए,
ज़िन्दगी की धूप में ख़ुद को सुखाते हैं वो लोग.
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जिनकी ज़हरीली ज़बानों पर नहीं कोई लगाम,
वक़्त आने पर हमेशा मुंह छुपाते हैं वो लोग.
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कितने बुज़दिल हैं हमारे दौर के दहशत-फ़रोश,
हक़ पे हैं तो क्यों नहीं आँखें मिलाते हैं वो लोग.
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2 comments:

Suresh Chandra Gupta said...

बहुत ही सुंदर रचना है. सोचने पर मजबूर करती है.

seema gupta said...

लाख हों आंखों में आंसू, मुस्कुराते हैं वो लोग.
दूसरों के सामने यूँ गम छुपाते हैं वो लोग.

" bhut sunder"

" ankh agr maire nam na ho, ye to nahee koee gum na ho..."

Regards