Friday, October 17, 2008

सर सैयद अहमद खान [जन्म-दिवस पर विशेष]

सर सैयद [1817-1898] का व्यक्तित्व उनकी अदभुत दूरदर्शिता, विवेक-धर्मिता, संवेदनशीलता और स्वदेश-भक्ति के तानों बानों से निर्मित है. इस व्यक्तित्व के मूल में तत्कालीन मुस्लिम समाज की आर्थिक-विपन्नता, शैक्षिक पिछडेपन और विवेक-शून्य भावुकता के प्रति जहाँ पीड़ा है, वहीं बहु-धर्मी, बहुजातीय एवं बहु-राष्ट्रीय स्वदेश को एकराष्ट्रीय चेतना से जोड़ने और नैराश्य से जूझने के बावजूद, निरंतर जोड़ते रहने की भरपूर ललक है.
बाईस वर्ष की अवस्था में पिता के निधनोपरांत, सर सैयद अहमद खान ने 1839 ई0 में कंपनी सरकार की नायब मुंशी की नोकरी अवश्य कर ली, किंतु हाथ-पर-हाथ धर कर उसी से गुज़ारा करने के लिए नहीं, अपितु मुन्सफी से सम्बंधित दीवानी के कानूनों का पुस्तक के रूप में खुलासा प्रस्तुत करके अपनी विलक्षण प्रतिभा की पहचान बनाते हुए. उन्होंने अपनी इसी प्रतिभा के आधार पर मुन्सफी की प्रतियोगी परीक्षा में उल्लेख्य सफाता प्राप्त की और 1841 ई0 में मैनपुरी में मुंसिफ नियुक्त हुए. स्पष्ट है कि यह नोकरी अंग्रेज़ी सरकार की कृपा का परिणाम नहीं थी. दिल्ली के निवासकाल में 'आसारुस्सनादीद' शीर्षक पुस्तक लिखकर सर सैयद ने दिल्ली की 232 इमारतों का शोधपरक ऐतिहासिक परिचय प्रस्तुत किया और इस पुस्तक के आधार पर उन्हें रायल एशियाटिक सोसाइटी लन्दन का फेलो नियुक्त किया गया. गार्सां-द-तासी ने इसका फ़्रांसीसी भाषा में अनुवाद किया जो 1861 ई0 में प्रकाशित हुआ. उनकी इसी विलक्षण प्रतिभा से प्रभावित होकर एडिनबरा विश्वविद्यालय ने उन्हें 1889 ई0 में एल-एल.डी. की उपाधि से सम्मानित किया था.
1857 की महाक्रान्ति और उसकी असफलता के दुष्परिणाम उन्होंने अपनी आंखों से देखे. घर तबाह हो गया, निकट सम्बन्धियों का क़त्ल हुआ, उनकी मां जान बचाकर एक सप्ताह तक घोडे के अस्तबल में छुपी रहीं. किंतु उन्होंने धैर्य और सहनशीलता से काम लिया, दिल्ली पूरी तरह मुसलामानों के रक्त से लाल हो चुकी थी जिसकी अभिव्यक्ति प्रसिद्ध कवि ग़ालिब ने इन शब्दों में की थी -"चौक जिसको कहें वो मक़तल है / घर बना है नमूना ज़िन्दाँ का./ शहरे-देहली का ज़र्रा-ज़ररए-ख़ाक / तशनाए-खूँ है हर मुसलमाँ का." पंडित नेहरू ने भी 'डिस्कवरी आफ इंडिया' में इस तथ्य की पुष्टि की है. वे लिखते हैं -"1857 की जनक्रांति को कुचलने के बाद ब्रिटिश सरकार ने हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों का जान-बूझकर अधिक दमन किया."स्पष्ट है कि महाक्रान्ति की विफलता ने ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में मुसलमानों की साख तो समाप्त कर ही दी थी उन्हें आर्थिक स्तर पर भी पूरी तरह तोड़ दिया था.
धैर्य और सहनशीलता की मूर्ति सर सैयद अहमद खान ने अपनी गंभीर सूझ-बूझ के आधार पर ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया की चिंता किए बिना, जनक्रांति के कारणों पर 1859 ई० में 'असबाबे-बगावते-हिंद' शीर्षक एक महत्वपूर्ण पुस्तिका लिखी और उसका अंग्रेज़ी अनुवाद ब्रिटिश पार्लियामेंट को भेज दिया. सर सैयद के मित्र राय शंकर दास ने जो उन दिनों मुरादाबाद में मुंसिफ थे सर सैयद को समझाया भी कि वे पुस्तकों को जला दें और अपनी जान खतरे में न डालें. किंतु सर सैयद ने उनसे स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि उनका यह कार्य देशवासियों और सरकार की भी भलाई के लिए आवश्यक है. इसके लिए जान-माल का नुकसान उठाने का खौफ उनके मार्ग में अवरोधक नहीं बन सका. क्रांति के जोखिम भरे विषय पर कुछ लिखने वाले सर सैयद प्रथम भारतीय हैं.
सर सैयद अहमद खान जानते थे कि पंजाब से लेकर बिहार तक का क्षेत्र आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और अंग्रेज़ी शिक्षा में बंगाल और महाराष्ट्र की तुलना में बहुत पीछे है. उसे राजनीती से कहीं अधिक शिक्षा की आवश्यकता है. उस शिक्षा कि जो मनुष्य में भावुकता के स्थान पर विवेक को जन्म देती है, संकीर्णता और धर्मान्धता की जगह संतुलित और संवेदनशील जीवनदृष्टि प्रदान करती है और स्वदेशवासियों के प्रति दायित्व के एहसास से आत्मा का परिष्कार करती है. उनहोंने 1864 में इसी उद्देश्य से 'साइंटिफिक सोसाइटी' की स्थापना की और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के प्रकाश को आम पढ़े-लिखे शहरी तक पहुंचाने का प्रयास किया. शिक्षा-संस्था खोलने का विचार हुआ तो अपनी सारी जमा-पूँजी यहांतक कि मकान भी गिरवी रख कर यूरोपीय शिक्षा-पद्धति का ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से इंगलिस्तान की यात्रा की. लौटकर आए तो कुछ वर्षों के भीतर ही मई 1875 ई0 में अलीगढ़ में 'मदरसतुलउलूम' की स्थापना की जो दो वर्षों बाद 1877 में एम.ए.ओ. कालेज के नाम से जाना गया और 1920 में जिसे विश्वविद्यालय के रूप में प्रतिष्ठित किया गया.
सर सैयद के 'एम.ए.ओ. कालेज' के द्वार सभी धर्मावलम्बियों के लिए खुले हुए थे. पहले दिन से ही अरबी फ़ारसी भाषाओं के साथ-साथ संस्कृत भाषा कि शिक्षा की भी व्यवस्था की गई. स्कूल के स्तर तक हिन्दी के अध्ययन-अध्यापन को भी अपेक्षित समझा गया और इसके लिए पं0 केदारनाथ अध्यापक नियुक्त हुए.सकूल तथा कालेज दोनों ही स्तरों पर हिन्दू अध्यापकों की नियुक्ति में कोई संकोच नहीं किया गया. कालेज के गणित के प्रोफेसर जादव चन्द्र चक्रवर्ती को अखिल भारतीय स्तर पर ख्याति प्राप्त हुई. एक लंबे समय तक चक्रवर्ती गणित के अध्ययन के बिना गणित का ज्ञान अधूरा समझा जाता था.
उन्नीसवीं शताब्दी में सर सैयद अहमद खान इस दृष्टि से अद्वितीय हैं कि उनहोंने कभी अकेले मुसलमानों को संबोधित नहीं किया. उनके भाषणों में हिन्दू मुसलमान बराबर से शरीक होते थे. उनहोंने मुसलमानों कि दशा सुधरने के लिए यदि कुछ किया या करना चाहा तो अपने हिन्दू मित्रों के सुझाव और सहयोग को नज़रंदाज़ नहीं किया. उनहोंने हिन्दुओं के मन में मुसलमानों के पिछडेपन के प्रति गहरी सहानुभूति जगाई. परिणाम यह हुआ कि जहाँ एक ओर कालेज के लिए मुसलमानों ने चंदा दिया वहीं हिन्दुओं का सहयोग भी कम नहीं मिला.
सर सैयद अहमद खान संत या महात्मा नहीं थे, किंतु उनकी नियति कबीर की नियति से पर्याप्त मेल खाती थी. इस्लाम की विवेक-सम्मत व्याख्या करने की प्रतिक्रिया यह हुई कि संकीर्ण मुसलमानों ने उन्हें काफिर घोषित कर दिया और मक्के तथा मदीने से उनके विरुद्ध क़त्ल किए जाने के फ़तवे मंगा लिए. सर सैयद ने कांग्रेस का नॅशनल होना स्वीकार नहीं किया. स्वीकार तो सैयद बदरुद्दीन तैयबजी और प्रोफेसर के. सुंदर रमन अय्यर ने भी नहीं किया, किंतु ह्यूम की शह पाकर बंगाली ब्राहमणों ने उन्हें ब्रिटिश भक्त और कट्टर-पंथी तक कह दिया. ऐसा उस समय किया गया जबकि सर सैयद ने तिलक कि भांति गणेशोत्सव और शिवाजी उत्सव के ढर्रे पर मुसलमानों को किसी मुस्लिम समर्थक उत्सव के लिए प्रोत्साहित नहीं किया, चापेकर बंधुओं की तरह कोई व्यायाम मंडल नहीं बनाया जिसमें स्वजातीय सदस्यों को फौजी ड्रिल, लाठी तलवार चलाना और घुड़सवारी सिखाई जाती या सावेरकर की भांति मुस्लिमों के लिए मित्र-मेला नहीं संगठित किया.सर सैयद अहमद खान मुसलमानों और हिन्दुओं के विरोधात्मक स्वर को चुप-चाप सहन करते रहे. इसी सहनशीलता का परिणाम है कि आज सर सैयद अहमद खान को एक युग पुरूष के रूप में याद किया जाता है और हिंदू तथा मुसलमान दोनों ही उनका आदर करते हैं. 17 अकतूबर 1817 में दिल्ली में जन्मे इस बहुआयामी व्यक्तित्व की जीवनलीला 27 मार्च 1898 को समाप्त ज़रूर हो गई किंतु उसका प्रकाश आज भी करोड़ों भारतवासियों को रोशनी प्रदान कर रहा है.

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3 comments:

dhiru singh said...

निश्चित ही सर सय्यद अहमद खान जैसे एक या दो और लोग पैदा हो जाते तो भारत की तस्वीर ही और होती.
एक व्यक्तित्व की सही विवेचना करने पर आपको धन्यबाद

Suresh Chandra Gupta said...

@इस्लाम की विवेक-सम्मत व्याख्या करने की प्रतिक्रिया यह हुई कि संकीर्ण मुसलमानों ने उन्हें काफिर घोषित कर दिया और मक्के तथा मदीने से उनके विरुद्ध क़त्ल किए जाने के फ़तवे मंगा लिए.

क्या इस तरह के फतवे आज भी मंगाए जाते हैं?

फ़िरदौस ख़ान said...

बेहतरीन तहरीर है...आज सर सैयद जैसे लोगों की बेहद ज़रूरत है...