Tuesday, October 14, 2008

कहाँ ले जायेगा हमें यह कट्टरपन ?

कुछ भावुक्तावादी हिन्दुओं की भांति हिन्दी ब्लॉग-फलक पर मुसलामानों की वह खेप अभी नहीं आई है और शायद आएगी भी नहीं जो भाषा और विचार की पवित्रता को कड़वाहट का विष घोलकर तीखा बनाने के पक्षधर हैं. वैसे मुसलमानों में भी ऐसी दिव्य आत्माओं की कोई कमी नहीं है। किंतु वे डरते हैं कि यदि अन्य ब्लोग्धारियों की भांति वे भी चंगेजी तेवर [रोचक बात यह है कि कई ब्लॉग ऐसे दिखाई दिए जिनपर चंगेज़ खान को भी मुसलमान बताया गया है] और तेजाबी भाषा का प्रयोग करेंगे तो आतंकवादी समझे जाने का खतरा है. संहारात्मक और विध्वंसक रुख अख्तियार करना और वह भी केवल लेखन के माध्यम से, सबसे आसान काम है. न किसी मोर्चे पर जाना है, न किसी मुडभेड का खतरा.


आचार्यों ने सात्विक, राजसी और तामसी वृत्तियों की चर्चा की है और उनके लक्षण भी बताये हैं. अध्यात्म मनुष्य को सात्विकता का मार्ग दर्शाता है, धार्मिकता राजसी वृत्ति को जन्म देती है और कट्टरपन तामसी वृत्ति का धरोहर है. आध्यात्मिकता तो धीरे-धीरे विलुप्त सी हो रही है और जो बची-खुची है भी, उसपर धर्माचार्यों के आसन जमते जा रहे हैं. आस्था से कहीं अधिक दिखावा धर्म की अनिवार्य शर्त बन गया है और यह दिखावा स्वधर्म-वर्चस्व की भावना को जन्म ही नहीं देता, धर्म से इतर एक नए कट्टरपन को भी परिभाषित करता है. यह कट्टरपन स्वयं तो केवल तमाशाई बना रहता है और नई नस्ल के युवकों को आग में झोंक कर हाथ तापता रहता है. सर्व धर्म समभाव और सब धरती गोपाल की तथा सर्वं खल्विदं ब्रह्मास्मि की उक्तियाँ पुस्तकों में दम तोड़ रही हैं या कभी-कभी नेताओं से सुनी जा सकती हैं. इसका अंत कहाँ पर होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता. यह कट्टरपन केवल अपने ऊपर चिपकाए गए लेबल से हिन्दू या मुसलमान होता है अन्यथा धर्म की कोई दौलत इसके पास नहीं होती. इस कट्टरपन की परिभाषा केवल इतनी है कि यह मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की हामी नहीं भरता, संवेदंशीलता इसके मार्ग में घातक है, वितंडावाद इसकी आधार-शिला है और विधर्मियों का सर्वनाश इसका परम लक्ष्य है. काश हम इन बातों को समझ पाते और अपने लेखन को सौम्य बनाने की दिशा में प्रयत्नशील दिखायी देते. हमें याद रखना चाहिए कि दंगों-फसादों से उतना कट्टरता और साम्प्रदायिकता का विष नहीं फैलता जितना लेखन से फैलाया जा सकता है.

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सही कह रहे हैं आप।

All Mighty Spiritual Society said...

nicely described tamas, rajas and satva. good writing, good differentiation.