Sunday, October 12, 2008

हैराँ हूँ कि ये कौन सा दस्तूरे-वफ़ा है./ अर्श सिद्दीकी

हैराँ हूँ कि ये कौन सा दस्तूरे-वफ़ा है.
तू मिस्ले-रगे-जाँ है तो क्यों मुझसे जुदा है.
*****
गर अहले-नज़र है तो नहीं तुझको ख़बर क्यों,
पहलू में तेरे कोई ज़माने से खड़ा है.
*****
मैं शहरो-बियाबाँ में तुझे ढूंढ चुका हूँ,
क्या जाने तू किस हुज्लाए-पिन्हाँ में छुपा है.
*****
हम रखते हैं दावा कि हमें क़ाबू है दिल पर,
तू सामने आजाये तो ये बात जुदा है.
*****
ग़म है कि मुसलसल उसी शिद्दत से है जारी,
यूँ कहने को इस उम्र का हर लम्हा नया है.
*****
क्यों जागे हुए शहर में तनहा है हरेक शख्स,
ये रौशनी कैसी है कि साया भी जुदा है.
*****
महसूस किया है कभी तूने भी वो खंजर,
ग़म बनके जो हर शख्स के सीने में गडा है.
*****
ठहराए उसे कैसे कोई अर्श जफ़ा-केश,
जो मुझसे अलग रहके भी हमराह चला है.
********************

2 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया!

हम रखते हैं दावा कि हमें क़ाबू है दिल पर,
तू सामने आजाये तो ये बात जुदा है.

neeshoo said...

महसूस किया है कभी तूने भी वो खंजर,
ग़म बनके जो हर शख्स के सीने में गडा है.
*****
ठहराए उसे कैसे कोई अर्श जफ़ा-केश,
जो मुझसे अलग रहके भी हमराह चला है.

ये कुछ लाइने बहुत ही सुन्दर लगी ।