Tuesday, October 14, 2008

समन्दरों के मनाज़िर हैं क्यों निगाहों में।


समन्दरों के मनाज़िर हैं क्यों निगाहों में।
कोई तो है जो कहीं होगा इन फ़िज़ाओं में।
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अभी हवाएं न गुल कर सकेंगी इनकी लवें,
अभी तो जान है बुझते हुए चरागों में।
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हुई है आंखों को महसूस कितनी ठंडक सी,
तुम्हारा लम्स कहीं है शजर के सायों में।
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मैं उसको भूल चुका हूँ, ग़लत था मेरा ख़याल,
वो बार-बार नज़र आया मुझको ख़्वाबों में।
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ये आसमान, ये बादल, ये बारिशें, ये हवा,
हमारी तर्ह बँटे क्यों नहीं ये फ़िरकों में।
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ये इश्क आग के पानी का सुर्ख दरिया है,
हमें ये मिल नहीं सकता कभी किताबों में।
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छुपा था मेरे ही अन्दर वो धडकनों की तरह,
मैं उसको ढूंढ रहा था कहाँ सितारों में।
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2 comments:

neeshoo said...

क्या बात है बहुत ही बेहरतरीन गजल । बधाई

मनुज मेहता said...

अभी हवाएं न गुल कर सकेंगी इनकी लवें,
अभी तो जान है बुझते हुए चरागों में।

behtareen ghazal bhai
bahut sunder shabd.
www.merakamra.blogspot.com