Thursday, October 9, 2008

हवा टूटे हुए पत्तों को आवारा समझती है

हवा टूटे हुए पत्तों को आवारा समझती है।
भटकता देख कर हमको यही दुनिया समझती है।
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अक़ीदा क्या है, बस इक फ़ैसला है अक़्ले-इन्सां का,
हमारी अक़्ल दिल को खानए-काबा समझती है।
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पहोंचना चाहती है हर कसो-नाकस के हाथों तक,
नदी, पानी से हर इनसान का रिश्ता समझती है।
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मिज़ाजन वो भी मेरी तर्ह हँसता-मुस्कुराता है,
नज़र उश्शाक की उसको न जाने क्या समझती है।
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वो पड़ जाए अगर आंखों में होगा दर्द शिद्दत का,
उसे दुनिया फ़क़त अदना सा इक तिनका समझती है।
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ख़याल उसका है वो हमसे कोई परदा नहीं रखता,
तबीअत उसका हर इज़हारे-पेचीदा समझती है।
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2 comments:

Reetesh Gupta said...

वो पड़ जाए अगर आंखों में होगा दर्द शिद्दत का,
उसे दुनिया फ़क़त अदना सा इक तिनका समझती है।

बहुत बढ़िया ...सुंदर ..बधाई

seema gupta said...

पहोंचना चाहती है हर कसो-नाकस के हाथों तक,
नदी, पानी से हर इनसान का रिश्ता समझती है।
" mind blowing creation'

regards