Friday, August 15, 2008

पसंदीदा नज़्में / ज़ैदी जाफ़र रज़ा

1. यज्ञ और हवन
यज्ञ की आग पहले सुलगती थी
रौशन हवन कुण्ड होते थे
सारी फ़िज़ा
ऊदो-अम्बर की खुशबू के
हौज़े-मुक़द्दस में अशनान करती थी
पाकीज़गी का तसौवुर था हर सिम्त माहौल में.

यज्ञ होते हैं अब भी, मगर
यज्ञ की आग में
अब झुलसती हैं जिंदा जवां लडकियां
खिलखिलाती हुई बस्तियां
नन्हे मासूम बच्चों की किलकारियां
और अब जो हवन कुण्ड रौशन किए जाते हैं
उनमें जलते हैं मीनारो-गुम्बद, इबादत-कदे
बाइबिल, रहलो-कुरआं, सलीबें, सदाए-अजाँ
2. राख (1)
हर तरफ़ राख ही राख थी
राख का ढेर था
और कुछ भी न था.
एक सन्नाटा इस राख के ढेर से
दिल के वीरान-खानों के जलते हुए आबलों की तरह
दर्द-आलूद, पुरसोज़, बे-लफ्ज़ आवाज़ में
अपने ज़ख्मों के बोसीदा पैराहनों के
सुलगते लहू की कहानी सुनाने में मसरूफ था
राख को मैं ने छूने की कोशिश जो की
उंगलियाँ जल गयीं
इक पिघलता हुआ गर्म सय्याल
मेरी झुलसती हुई उँगलियों से गुज़रता हुआ
मेरी रग-रग में पेवस्त होने लगा.
मैं ने देखा मेरे जिस्म में कितनी ही बस्तियां
आग के आसमां छूते शोलों की ज़द में हैं
फरयाद करती हुई
अल-अमां, अल-मदद,
अल-हफीज, अल-मदद, अल-अमां
और मैं कितना मजबूर हूँ.
3. राख (2)
सर पे अपने कफ़न बाँध कर
जब बरहना हवाओं ने जलती हुई राख को
इस ज़मीं से कुशादा हथेली पे अपनी उठा कर
जहां भर की जिंदा फिजाओं की दहलीज़ पर रख दिया
अहले-दिल चीख उठे
जो मुहाफिज़ थे इंसानी क़दरों के
दुनिया के हर गोशे से
हो के सर-ता-क़दम मुज़महिल, चीख उठे
खूने-नाहक में डूबा नज़र आया हिन्दोस्तां.
4. राख (3)
सियाही में तब्दील होने से पहले
सुलगती हुई राख के एक अम्बार ने
मुझ को आवाज़ दी.
ऐ मुसाफिर ! कभी तूने देखा है
किस तर्ह आबादो-खुशहाल हँसते घरों को
दरिंदा-सिफत मज़हबी सर फिरे
नफरतों की धधकती हुई आग से
एक पल में बदल देते हैं राख में ?
देख उस गोशे में
राख की मोटी तह में दबी
कितनी मजबूरो-माज़ूर, उरियां-बदन
लुट चुकी, हाँपती-कांपती
दर्द-आमेज़ दोशीज़ा चीखें मिलेंगी तुझे
और उस से ज़रा फासले पर मिलेगा
बहोत दूर तक राख का इक समंदर
जहाँ ज़ह्र-आलूद मज़हब-ज़दा
ज़ाफरानी हवाओं ने
कितनी ही माँओं की ममता भरी कोख को चीर कर
गैर-जाईदा बच्चों को बाहर निकाला
तिलक और तिरशूल का जितना तेजाब था
उनपे छिड़का कि गल जाएँ नाज़ुक बदन
और फिर नेकरों में भरी आग का तांडव
देर तक खुल के होता रहा
ऐ मुसाफिर ! तेरे घर में कुछ
बाल-बच्चे तो होंगे
कुँवारी जवां लड़कियां भी तेरे घर में होंगी
उन्हें जाफरानी हवाओं के
गंदे इरादों से महफूज़ रखना
हमारी तरह वो बदलने न पायें कभी राख में
5। राख (4)
इस से पहले कि आज़ादी का जश्न मिल कर मनाएं !
मुझे ये बताओ
कहीं कुछ तुम्हें भी सुलगता सा महसूस होता है
या वहम है ये मेरा
जिसकी कोई हकीकत नहीं है.
चलो मान लेता हूँ ये वहम होगा.
मगर वो जो इक शहर का शहर
शोलों की ज़द में है
जिसको मैं अन्दर कहीं जिस्म की वादियों में
मुसलसल झुलसता हुआ देखता हूँ
उसे वहम किस तर्ह समझूं
वहाँ सिर्फ़ बदबू है
जलते हुए, राख होते हुए
बेखता, बे-ज़बां
हसरतों के जवां-साल जिस्मों की बदबू
ये एहसास क्यों सिर्फ़ मुझको है
तुमको नहीं है
मैं हैरत जादा हूँ !
मगर जश्ने आज़ादी तो हम मनाएंगे मिल कर
हवाओं में लहरायेंगे
मुल्क की साल्मीयत का परचम
इन्हीं जिस्मों की राख के ढेर पर बैठ कर.
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2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी said...

परवेज जी, जैदी जी की सभी नज्में अद्वितीय हैं। उन पर कहने को कुछ नहीं बचा सब की सब हकीकत को श्रेष्ठतम तरीके से बयान कर रही हैं।

आजाद है भारत,
आजादी के पर्व की शुभकामनाएँ।
पर आजाद नहीं
जन भारत के,
फिर से छेड़ें, संग्राम एक
जन-जन की आजादी लाएँ।

Pooja Prasad said...

Dr. Parvez, aapka blog meri nazarone se chupaa reh gaya tha! lag raha hai moti haath lag gaya hai. collection behtareen hai.

Shubhkaamnaeyen.