Wednesday, August 20, 2008

मक़बूल ग़ज़लें / अहमद फ़राज़

[1]
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ
पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ
किस किस से बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से खफा है तो ज़माने के लिए आ
कुछ तो मेरे पिन्दारे-मुहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ
इक उम्र से हूँ लज़्ज़ते-गिरिया से भी महरूम
ऐ राहते-जां मुझ को रुलाने के लिए आ
अब तक दिले-खुश-फ़ह्म को तुझ से हैं उमीदें
ये आखिरी शमएं भी बुझाने के लिए आ
[2]
सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
वरना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते
शिकवए-ज़ुल्मते-शब् से तो कहीं बेहतर था
अपने हिस्से की कोई शमअ जलाते जाते
इतना आसां था तेरे हिज्र में मरना जानां
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते
उसकी वो जाने उसे पासे-वफ़ा था कि न था
तुम फ़राज़ अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते
[3]
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उसके शह्र में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त है उसको ख़राब हालों से
सो अपने आपको बरबाद कर के देखते हैं
सुना है दर्द की गाहक है चश्मे-नाज़ उसकी
सो हम भी उसकी गली से गुज़र के देखते हैं
सुना है उसको भी है शेरो-शायरी से शगफ़
सो हम भी मोजज़े अपने हुनर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बामे-फलक से उतर के देखते हैं
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं
सुना है उसकी सियह-चश्मगी क़यामत है
सो उसको सुरमा-फरोश आँख भर के देखते हैं
सुना है उसके बदन के तराश ऐसे हैं
कि फूल अपनी क़बाएं कतर के देखते हैं
सुना है उसके शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी, जलवे इधर के देखते हैं
कहानियां ही सही सब मुबालगे ही सही
अगर वो ख्वाब है ताबीर कर के देखते हैं
****************

2 comments:

Udan Tashtari said...

पढ़वाने के लिए बहुत आभार.

Reality Bytes said...

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते
वरना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते

faraz Saab
your thoughts will never die.................................