Wednesday, August 20, 2008

बेहतरीन गज़लें / ज़ैदी जाफ़र रज़ा

[1]
खमोशी में हमेशा अम्न का साया नहीं होता
समंदर का लबो-लहजा बहोत अच्छा नहीं होता
मेरे ख़्वाबों में आने को वो अक्सर आ तो जाता है
मगर अंदाज़ उसकी खुश-मिज़ाजी का नहीं होता
सफ़र आसान हो जाता है ऐसे राहगीरों का
कि जिन की राह में कुहसार या दरिया नहीं होता
दरख्तों के हसीं झुरमुट में जब मिलते हैं दो साए
ज़बानों से, दिलों का उनके अन्दाज़ा नहीं होता
मुहब्बत जुर्म है, पढ़ना न इसकी दास्तानों को
कहा था माँ ने, लेकिन मुझ से अब ऐसा नहीं होता
हर एक आ आ के उसपर जब भी चाहे नाम लिख जाए
वरक दिल का कभी भी इस कदर सादा नहीं होता.
[2]
चलो हुकूमते-हाज़िर से इक सवाल करें
हम अपने ख़्वाबों को, क्यों रोज़ पायमाल करें
वो पत्थरों का अगर है तो मोम हम भी नहीं
बदल दें वक़्त को, हालात हस्बे-हाल करें
नकाबे-राह्बरी में खुदाओं के हैं बदन
खरीद कर, ये जिसे चाहें मालामाल करें
हमारा घर भी है सैलाबे-वक्त की ज़द में
बचेगा ये भी नहीं, कितनी देख-भाल करें
गिरह जो डाली है दिल में पड़ोसियों ने मरे
न खुल सकेगी, भले रिश्ते हम बहाल करें
सितमगरों से कभी दोस्ती नहीं अच्छी
क़रीब आयें तो ये ज़िन्दगी मुहाल करें
वो रंगों-नूर का पैकर है जो भी चाहे करे
सवाल उससे, हमारी है क्या मजाल, करें
[3]
मैं किसी जंगल के वीरानों में गुम हो जाऊँगा
इक हकीक़त बन के अफ़सानों में गुम हो जाऊँगा
जानता हूँ अश्क की सूरत कटेगी ज़िन्दगी
मोतियों के बे-बहा दानों में गुम हो जाऊँगा
मैं नशा करता नहीं, फिर भी नशे में चूर हूँ
देखना कल,मय के पैमानों में गुम हो जाऊँगा
मुझ से पोशीदा नहीं होगा किसी के दिल का हाल
कीमिया होकर, शफाखानों में गुम हो जाऊँगा
गो नहीं मैं खुश-गुलू पर लहने-शीरीं के लिए
ढल के मीठी तान में गानों में गुम हो जाऊँगा
[4]
बदन आबशार का दूध सा,था धुला-धुला मरे सामने
वहीं एक चाँद मगन-मगन, था नहा रहा मरे सामने
मैं तकल्लुफात में रह गया, कोई और उसकी तरफ़ बढ़ा
उसे देखते ही बसद खुशी, वो लिपट गया मरे सामने
कभी फूल बन के जो खिल सका, तो खिलूँगा उसके ही बाग़ में
मुझे अपने होंटों से चूम लेगा, वो दिलरुबा मरे सामने
मैं अज़ल से हुस्न परस्त हूँ, मुझे क्यों बुतों से न इश्क़ हो
मैं न बढ़ सकूँगा जो आ गया, कोई बुतकदा मेरे सामने
नहीं चाँद में वो गुदाज़, जैसा गुदाज़ उसके बदन में है
कोई फूल उसका बदल नहीं, है वो गुल-अदा मेरे सामने
कहा उसने मुझ से कि इश्क़ के, ये रुमूज़ तुम नहीं जानते
वो गिना रहा था खुशी-खुशी, मेरी हर खता मेरे सामने
[5]
अगर ख़्वाबों को मिल जाता कहीं से आइना कोई
यकीनन छोड़ जाता उनपे नक्शे-दिलरुबा कोई
नहाकर चाँदनी में फूल की रंगत नहीं बदली
मगर खुशबू के बहकावे से कुछ घबरा गया कोई
मैं सबका साथ सारी उम्र ही देता रहा लेकिन
न जाने बात क्या थी क्यों नहीं मेरा हुआ कोई
गुलों से रात कलियों ने बहोत आहिस्ता से पूछा
हमारा खिलना छुप कर क्या कहीं है देखता कोई
दरख्तों ने चमन में सुब्ह की आपस में सरगोशी
फलों का आना हम सब के लिए है हादसा कोई
शिकारी के निशाने पर न आता वो किसी सूरत
परिंदा जानता गर, उसका ही मुश्ताक़ था कोई
समंदर में फ़ना होना ही दरिया का मुक़द्दर था
इसी सूरत निकल सकती थी बस राहे-बका कोई
कोई खुशबू-बदन था या फ़क़त एहसास था मेरा
मेरे कमरे में दाखिल हो गया आहिस्ता-पा कोई
तकल्लुफ बर्तरफ जाफर उसी से पूछ लो चलकर
निकालेगा वही इस कशमकश में रास्ता कोई
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1 comment:

Udan Tashtari said...

आभार इस प्रस्तुति के लिए.