Tuesday, August 12, 2008

हिन्दी ग़ज़ल / शैलेश ज़ैदी

चांदनी की ओट में श्वेताम्बरा आयी थी कल
था ये शायद स्वप्न कोई अप्सरा आयी थी कल
स्नेह पर संदेह उसके मैं करूँ, सम्भव नहीं,
मेरे दुःख पर आँख उसकी भरभरा आयी थी कल
मलमली कोमल फुहारें उड़ रही थीं हर तरफ़
मौसमी बारिश पहन कर घाघरा आयी थी कल
एक प्रेमी के निधन की सूचना देकर हवा
उसको आधी रात में जाकर डरा आयी थी कल
देखिये बनवास अब मिलाता है किस आदर्श को
राजनीतिक-मंच पर इक मंथरा आयी थी कल
थी सफलता की मुझे आशा, मगर इतनी न थी
मेरी ये उपलब्धि ही, मुझको हरा आयी थी कल
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