Wednesday, August 13, 2008

सूरदास के रूहानी नग़मे / शैलेश ज़ैदी [क्रमशः 4]

[ 22 ]
हरी बिन अपनौ को संसार.
माया-लोभ-मोह हैं चांडे, काल-नदी की धार..
ज्यौं जन संगति होति नाव मैं, रहति न परसैं पार..
तैसैं धन-दारा, सुख-संपति, बिछुरत लगै न बार..
मानुष जनम, नाम नरहरि कौ, मिलै न बारम्बार..
इहिं तन छन-भंगुर के कारन, गरबत कहा गंवार..
जैसैं अंधौ अंधकूप मैं, गनत न खाल पनार..
तैसेहिं 'सूर' बहुत उपदेसैं, सुनि सुनि गे कै बार..


अपना नहीं जहान में कोई बजुज़ खुदा
हिर्सो-हवस का, लज़्ज़ते-दुनिया का सिल्सिला
जूए-अजल की धार का जैसे हो काफ़ला
कश्ती में जैसे होते हैं हमराह कितने लोग
साहिल पे आके साथ सभी का है छूटता
वैसे ही मालो-ज़ौजओ-आसाइशे-जहाँ
इक पल में सब बिछड़ते हैं आती है जब क़ज़ा
इंसान की हयात वो नामे-खुदाए-पाक
मिलते नहीं किसी को भी दुनिया में बारहा
इस जिस्मे-आरज़ी पे न बद-अक़्ल कर गुरूर
नादान जान ले इसे हासिल नहीं बक़ा
नाबीना जैसे कूएँ में ज़ुल्मत के क़ैद हो
रहता नहीं नशेब का जैसे उसे पता
वैसे ही 'सूर' सुनके भी आला नसीहतें
गिरते हैं ख़न्दकों में अंधेरों की बेहया
[ 23 ].
सब तजि भजिये नंदकुमार.
और भजे तैं काम सरै नहिं, मिटे न भव जनजार..
जिहिं जिहिं जोनि जनम धारयौ,बहु जोरयौ अध कौ भार
तिहिं काटन कौ समरथ हरि कौ, तीछन नाम कुठार..
वेद पुरान भागवत गीता, सब कौ यह मत सार..
भव समुद्र हरिपद नौका बिनु, कोऊ न उतरै पार..
यह जिय जानि इहीं छिन भजि, दिन बीतत जात असार..
'सूर' पाई यह समय लाहू लहि, दुर्लभ फिरि संसार..


सब को तज कर मालिके-कुल की इबादत कीजिये.
नन्द के बेटे की लीलाओं से उल्फ़त कीजिये..
और माबूदों से बन सकता नहीं कोई भी काम
घेरे रक्खेंगी जहाँ भर की बलाएं सुब्हो-शाम..
जिस किसी खिलक़त में जब जैसे जहाँ पैदा हुए
जोड़ते आये गुनाहों के हमेशा सिलसिले..
काटना है इन गुनाहों को तो कीजे एतबार..
काट सकती है इन्हें नामे-हरी की तेज़ धार..
भागवत गीता में, वेदों में, पुरानों में उसे
याद करते आये हैं हम सब इसी अंदाज़ से..
जो न हो हरि की मुहब्बत के सफीने पर सवार
बहरे-दुनिया कर नहीं सकता किसी सूरत से पार..
इस हकीकत को समझ कर कीजिये खालिक को याद..
बे इबादत के, गुज़र जाते हैं सब दिन बेमुराद..
मिल गया है 'सूर' मौक़ा कुछ उठा लें फ़ायदा..
फिर न होगा इस जहाँ की ज़िन्दगी से वास्ता..
[ 24 ]
जौ मन कबहुँक हरि कौ जांचै..
आन प्रसंग उपासन छाँडै, मन-वच-कर्म अपने उर सांचै..
निसि दिन स्याम सुमिरि जस गावै, कलपन मेटि प्रेम रस मांचै..
यह ब्रत धरे लोक मैं बिचरै, सम करी गिने महामनि कांचै..
सीत-ऊश्न, सुख-दुःख नहिं मानै, हानि-लाभ कछु सोंच न रांचै..
जाइ समाइ 'सूर' वा विधि मैं, बहुरि न उलटि जगत मैं नांचै..

परख ले दिल अगर ज़ाते-हरी को.
तो गैरों की इबादत तर्क कर के.
बने क़ौलो-अमल से, दिल से हक़-गो
रहे दिन-रात ज़िक्रे-श्याम लब पर
डुबो दे प्रेम रस में बेकली को..
जहाँ में घूमे गर ये अज़्म लेकर
तो समझे कांच को हीरे को यकसां
असर कुछ भी न सर्दो-गर्म का ले
किसी सूरत भी दुःख-सुख को न माने
नफ़ा होता हो, या होता हो नुक़सां
उभरने दे न हरगिज़ बद-दिली को..
समो दे 'सूर' ख़ुद को यूँ खुदा में
न झेले फिर जहाँ की बरहमी को..
[ 25 ]
झूठे ही लगि जनम गँवायौ.
भूल्यो कहा स्वपन के सुख मैं, हरि सौं चित न लगायौ..
कबहुँक बैठ्यो रहिस-रहिस कै, ढोटा गोद खिलायौ..
कबहुँक फूलि सभा मैं बैठ्यो, मूछनि ताव दिखायौ..
टेढी चाल, पाग सिर टेढी, टेढ़ैं टेढ़ैं धायौ..
'सूरदास' प्रभु क्यों नहिं चेतत, जब लगि काल न आयौ..

बरबाद कर दी झूठ में पड़कर ये ज़िन्दगी
गाफिल हुआ है पा के फ़क़त ख्वाब की खुशी..
खालिक़ से लौ लगाई नहीं एक पल कभी..
हो-हो के मस्त, बैठ के आसाइशों के साथ..
औलाद को खिलाता रहा गोद में कभी.
मगरूर बन के बैठा कभी महफ़िलों के बीच..
मूछों को अपनी ऐंठ के दिखलाई हेकडी
साफ़े को तिरछा बाँध के, बांकी बना के चाल.
भटका किया इधर से उधर थी वो कज-रवी..
ऐ 'सूर' ! इस से पहले कि आये पयामे-मौत..
क्यों होश में तू आता नहीं, क्यों है बे-दिली..
[ 26 ]
जैसैं राखहु तैसैं रहौं.
जानत हौं दुःख-सुख सब जन के, मुख करि कहा कहौं.
कबहुँक भोजन लहौं कृपानिधि, कबहुँक भूख सहौं..
कबहुँक चढ़ौं तुरंग महागज, कबहुँक भार बहौं..
कमल नयन, घनस्याम मनोहर, अनुचर भयौ रहौं..
'सूरदास' प्रभु ! भगत कृपानिधि, तुम्हारे चरण गहौं..

जैसे रखते हैं उसी हाल में रहता हूँ मैं.
आप दुःख-सुख से हैं बन्दों के बखूबी वाक़िफ़,
इसलिए कुछ भी ज़बां से नहीं कहता हूँ मैं..
कभी खाना जो मयस्सर हो तो खा लेता हूँ,
भूख का बोझ कभी हंस के उठा लेता हूँ..
घोडे-हाथी पे कभी बैठ के खुश होता हूँ.
कभी मजदूर की मानिंद वज़न ढोता हूँ..
चाहता हूँ कि रहूँ श्याम का खादिम बन कर
ज़िन्दगी 'सूर' हो बस श्याम के चरनों में बसर..
[ 27 ]
यह सब मेरियै आई कुमति..
अपनै ही अभिमान दोष दुःख, पावत हौं मैं अति..
जैसैं केहरि उझकि कूप जल, देखै आप परति..
कूद परयौ कछु भरम न जान्यौ, भई आइ सोई गति..
ज्यौं गज फटिक सिला मैं देखत, दसननि डारत हति..
जौ तू 'सूर' सुखहिं चाहत है, तौ क्यों बिषय बिरति..

ये तो मेरी ही बद-अक्लियों का,है नतीजा जिसे झेलता हूँ..
अपने पिन्दार की सब खता है, रंजो-गम में जो मैं मुब्तिला हूँ.
देख कर अपनी परछाईं जैसे, नासमझ शेर कूएँ में कूदे,
मेरी हालत भी है उसके जैसी, कुछ भी करता हूँ बे सोचे-समझे.
संगे बिल्लौर में अपनी सूरत, देख कर जैसे बदमस्त हाथी,
दांत से मारे टक्कर पे टक्कर, और हो जाए बे वज्ह ज़ख्मी
मैं भी ख़ुद अपनी नादानियों से, आये दिन चोट खाता हूँ गहरी..
चाहता है अगर 'सूर' खुशियाँ, वादियों से निकल आ हवस की.
**************************** क्रमशः

2 comments:

Udan Tashtari said...

आभार इस प्रस्तुति के लिए.

Sumant Misra said...

डा० साहब,हृदय से मेरा प्रणाम स्वीकार करें। ब्लागों पर टहलते-टहलते आपके ब्लाग तक पहुँचा और लगातार पाँच घण्टे तक तब तक पढ़ता रहा,जब तक पूरा ब्लाग समाप्त नहीं कर लिया। कभी पढ़ा था-स हितकरः इति साहित्यः! जो हितकर है वही साहित्य है।ब्लाग की सम्पूर्ण रचनाएँ चाहे वह आप की हों या किसी अन्य की,जहाँ समाजोपयोगी हैं वहीं आपके शुद्ध,परिष्कृत,एवं द्वन्द्व रहित मानसिकता को अपनें सम्पूर्ण सौन्दर्य के साथ व्यक्त करतीं हैं।भांति-भांति के वाद-विवाद से ग्रसित भारतीय समाज एवं विद्वान से लगनें वाले लोग हितकर छोड़ नाम और दाम के नश्वर- लोभ में रुचिकर गढ़नें में लगे हों, वहाँ आप जैसे शाश्वत मूल्याधारित चिन्तक,रचनाकार एवं शुद्ध भारतीय के लिए मै इतना ही कह सकता हूँ कि ॥ जीवेम शरदः शतम ॥ सुमन्त मिश्र