Monday, August 4, 2008

प्रोफ़ेसरी / ज़ैदी जाफ़र रज़ा

[ एक तंज़िया नज़्म, यूनिवर्सिटी के उस्तादों से माज़रत के साथ ]

इल्मो-हुनर की दौड़ है दर्दे - सरी की दौड़
दिन रात जाँ खपाती है दानिशवरी की दौड़
तहकीक़ का तो काम है कुबके दरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में प्रोफेसरी की दौड़.

कैसा भी कैरियर हो न कुछ फ़िक्र कीजिये
गढ़ गढ़ के, कारनामों का बस ज़िक्र कीजिये
दिलबर समझिये सबको, ये है दिलबरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में, प्रोफेसरी की दौड़

गर डीन आपका है, चेयरमैन आपका
बस जान लीजिये कि है सुख चैन आपका
इक छोटी-मोटी है ये फ़क़त फ़्लैटरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में प्रोफेसरी की दौड़

कुछ शैखे-जामिया से तअल्लुक़ बनाइये
रूठे हों देवता जो उन्हें भी मनाइए
जादू ज़बान बनिए, है जादूगरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में, प्रोफेसरी की दौड़

प्रोमोशनों के दौर में है और भी मज़ा
अच्छा बुरा है कौन, ये है कौन देखता
होती है आज थोक में सौदागरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में, प्रोफेसरी की दौड़

आलिम अगर नहीं हैं, तो बन जाइये जनाब
मैटर उडा उड़ा के, बना लीजिये किताब
चोरी का रास्ता है उड़नतश्तरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में प्रोफेसरी की दौड़.
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3 comments:

परमजीत बाली said...

परवेज़ जी, बहुत बढिया नज्म है। बहुत सही लिखा-

प्रोमोशनों के दौर में है और भी मज़ा
अच्छा बुरा है कौन, ये है कौन देखता
होती है आज थोक में सौदागरी की दौड़
अच्छी है सबसे दौड़ में, प्रोफेसरी की दौड़

Priyankar said...

वाह ! सही खाका खींचा है ज्ञान के तथाकथित केन्द्रों में फैले भ्रष्टाचार का .

Udan Tashtari said...

यहाँ प्रस्तुत करने का आभार.