Sunday, August 10, 2008

सहारे / वामिक़ जौनपुरी

पहली मई, यौमे-मज़दूर के तअल्लुक़ से
बढे चलो बढे चलो
यही निदाए-वक़्त है
ये कायनात, ये ज़मीं
निज़ामे-शम्स का नगीं
ये कहकशां सा रास्ता,
इसी पे गामज़न रहो
ये तीरगी तो आरजी है, मत डरो
यहाँ से दूर
कुछ परे पे सुब्ह का मुक़ाम है
सलाए-बज्मे-आम है
क़दम क़दम पे इस कदर रुकावटें हैं अल-अमां
मगर अजीब शान से ये कारवां रवां-दवां
चला ही जाएगा परे
उफक से भी परे कहीं
तुम्हारे नक्शे-पा में जिंदगी का रंग
हंस रहा है
ताके पीछे आने वालों को
पता ये चल सके
कि इस तरफ़ से एक कारवां गुज़र चुका है कल
और अपने जिस्मो-जान हमको वक्फ कर चुका है कल
*******************************

2 comments:

मीत said...

बहुत बढ़िया. शुक्रिया.

Udan Tashtari said...

वामिक़ जौनपुरी जी को पढ़वाने के लिए आभार.