Monday, August 25, 2008

मैं क्या करूं / ज़ैदी जाफ़र रज़ा

मैं गज़ल की पलकों पे आंसुओं को, न देख पाया मैं क्या करूँ
उसे लफ़्ज़-लफ़्ज़ संवारा, फिर भी न मुस्कुराया मैं क्या करूँ
मैंने कितना चाहा कि होश में, किसी तर्ह उसको मैं ला सकूँ
मैं संभाल पाया न उसको, ऐसा वो डगमगाया मैं क्या करूँ
मैं उड़ा रहा था वरक़-वरक़, सभी ख्वाब आज फ़िजाओं में
मगर एक ख्वाब ने रुक के, मुझको बहोत रुलाया मैं क्या करूँ
मैंने जब से देखा है उसको, एक हसीन साए की शक्ल में
मुझे खौफ़नाक सा लगता है, मेरा अपना साया मैं क्या करूँ
वो मुहब्बतों के गुनाहगार थे, गाँव भर की निगाह में
उन्हें रात दी गयीं सूलियां, मेरा दिल भर आया मैं क्या करूँ
ये जो आहटें हैं उसी की हैं, सरे-शाम कैसे वो आ गया !
मैं अकेला होता तो ठीक था, ऐ मेरे खुदाया मैं क्या करूँ
मैं दरख्त से कोई बात पूछता, जब तक आ गयीं आंधियां
मेरे सामने, उसे जड़ से आँधियों ने गिराया, मैं क्या करूँ
वो जो हर क़दम पे था साथ-साथ, न जाने उसको ये क्या हुआ
वो बरत रहा है अब इस तरह, कि लगे पराया मैं क्या करूँ
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