Tuesday, August 12, 2008

परवेज़ फ़ातिमा की दो ग़ज़लें

[ 1 ]
यकीं करो, न करो, है ये अख्तियार तुम्हें
वफ़ा पे अपनी, नहीं ख़ुद भी एतबार तुम्हें
दिलो-दमाग़ की तकरार से है कब फुर्सत
किसी भी लमहा मयस्सर नहीं क़रार तुम्हें
न जाने कैसा ये आलम है ख़ुद-फरेबी का
कि रेगज़ार भी लगता है लालाज़ार तुम्हें
अना तुम्हारी डुबो देगी एक दिन तुमको
न होश आ सका होकर भी शर्मसार तुम्हें
चुभोते आए हो अबतक जिन्हें ज़माने को
मिलेंगे देखना राहों में अब वो खार तुम्हें
वो कश्ती जिसको डुबोने की तुमको जिद सी है
वाही निकालेगी तूफां से बार-बार तुम्हें
[ 2 ]
कहते हैं वो तह्ज़ीबो-रिवायात मिटा दो
ये सब हैं बुजुर्गों के तिलिस्मात, मिटा दो
गैरों की हुकूमत हमें अच्छी नहीं लगती
गैरों की हुकूमत के निशानात मिटा दो
जिस तर्ह भी हम चाहेंगे तारीख लिखेंगे
जो राह में हायल हैं वो जज़बात मिटा दो
माज़ी पे तुम्हें फ़ख्र है, नादान हो शायद
बेहतर है कि माज़ी के खयालात मिटा दो
महफूज़ हो जिनमें कहीं नसलों की फ़जीलत
चुन-चुन के वो लायानी इबारात मिटा दो
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2 comments:

नीरज गोस्वामी said...

अना तुम्हारी डुबो देगी एक दिन तुमको
न होश आ सका होकर भी शर्मसार तुम्हें
चुभोते आए हो अबतक जिन्हें ज़माने को
मिलेंगे देखना राहों में अब वो खार तुम्हें
*****
माज़ी पे तुम्हें फ़ख्र है, नादान हो शायद
बेहतर है कि माज़ी के खयालात मिटा दो
महफूज़ हो जिनमें कहीं नसलों की फ़जीलत
चुन-चुन के वो लायानी इबारात मिटा दो
वाह...वा.करते रहने को जी कर रहा है...एक से बढ़कर एक शेर से सजी आप की ये दोनों ग़ज़लें बेमिसाल हैं...बहुत सादगी से बहुत गहरी बात कहने का हुनर कोई आप से सीखे...
नीरज

राजीव रंजन प्रसाद said...

डॉ0 परवेज़

लाजवाब गज़लें हैं आपकी।

वो कश्ती जिसको डुबोने की तुमको जिद सी है
वाही निकालेगी तूफां से बार-बार तुम्हें

***राजीव रंजन प्रसाद

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