Thursday, August 7, 2008

ओबैदुल्लाह अलीम की ग़ज़लें

अज़ीज़ उतना ही रक्खो कि जी संभल जाए
अब इस कदर भी न चाहो कि दम निकल जाए
मी हैं यूँ तो बहोत, आओ अब मिलें यूँ भी
कि रूह गर्मिए-अनफ़ास से पिघल जाए
मुहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा
कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए
जाहे वो दिल जो तमन्नाए-ताज़ा-तर में रहे
खुशा वो उम्र जो ख़्वाबों में ही बहल जाए
मैं वो चरागे-सरे-रहगुज़ारे-दुनिया हूँ
जो अपनी ज़ात की तनहाइयों में जल जाए
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खयालो-ख्वाब हुई हैं मुहब्बतें कैसी
लहू में नाच रही हैं ये वहशतें कैसी
न शब् को चाँद ही अच्छा न दिन को मेह्र अच्छा
ये हम पे बीत रही हैं क़यामतें कैसी
वो साथ था तो खुदा भी था मेहरबाँ क्या क्या
बिछड़ गया तो हुई हैं अदावतें कैसी
हवा के दोश पे रक्खे हुए च़राग हैं हम
जो बुझ गए तो हवा से शिकायतें कैसी
जो बे-ख़बर कोई गुज़र तो ये सदा दी है
मैं संगे-राह हूँ, मुझ पर इनायतें कैसी
नहीं कि हुस्न ही नैरंगियों में ताक़ नहीं
जुनूँ भी खेल रहा है सियासतें कैसी
ये दौरे-बे-हुनरां है बचा रखो ख़ुद को
यहाँ सदाक़तें कैसी, करामतें कैसी.
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3 comments:

मीत said...

मुहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा
कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए

बहुत खूब. गज़लें पढ़वाने का शुक्रिया.

Udan Tashtari said...

मेरे पसंदीदा शायर-बहुत आभार.

कैलाश मोहनकार said...

nice ghazals.