Friday, August 22, 2008

काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएं / अख्तर शीरानी

काम आ सकीं न अपनी वफ़ाएं तो क्या करें
उस बे-वफ़ा को भूल न जाएँ तो क्या करें
मुझ को है एतराफ दुआओं में है असर
जाएँ न अर्श पर जो दुआएं तो क्या करें
एक दिन की बात हो तो उसे भूल जाएँ हम
नाज़िल हों रोज़ दिल पे बालाएं तो क्या करें
शब् भर तो उनकी याद में तारे गिना किए
तारे से दिन को भी नज़र आयें तो क्या करें
अहदे-तलब की याद में रोया किए बहोत
अब मुस्कुरा के भूल न जाएँ तो क्या करें
अब जी में है कि उनको भुला कर ही देख लें
वो बार-बार याद जो आयें तो क्या करें
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1 comment:

Anonymous said...

bahut khoob.

अब जी में है कि उनको भुला कर ही देख लें
वो बार-बार याद जो आयें तो क्या करें