Friday, August 22, 2008

समझा नहीं मुझे / उस्मान असलम

वो शख्स पास रह के भी समझा नहीं मुझे
इस बात का मलाल है, शिकवा नहीं मुझे
मैं उसको बे-वफ़ाई का इल्ज़ाम कैसे दूँ
उसने तो इब्तिदा से ही चाहा नहीं मुझे
क्या-क्या उमीदें बाँध के आया था सामने
उसने तो आँख भर के भी देखा नहीं मुझे
पत्थर समझ के पाँव की ठोकर पे रख दिया
अफ़सोस उसकी आँख ने परखा नहीं मुझे
मैं कब गया था सोच के ठहरूंगा उसके पास
अच्छा हुआ कि उसने भी रोका नहीं मुझे
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1 comment:

Udan Tashtari said...

आभार इस प्रस्तुति के लिए.