Tuesday, August 5, 2008

मेडिकल कालेज का एक कमरा और मैं / ज़ैदी जाफ़र रज़ा

इब्तिदाई अल्फाज़
जनवरी 1991 में जब मैं हार्ट अटैक की ज़द में आया, मुझे यूनिवर्सिटी के मेडिकल कालेज में डाल दिया गया. अस्पतालों से मैं बहोत घबराता था और उन्हें खुदा जाने क्यों इलाज-गाह के बजाय क़त्ल-गाह समझता था. चालीस-पैतालीस दिन अस्पताल में रहना कोई मामूली बात न थी. सुबह शाम कार्डियोग्राफी, ज्यादा बोलने पर पाबंदी, कभी नब्ज़ देखने और कभी टेम्परेचर देखने के लिए रोज़ नई नई नर्सों का आना जाना, टाइलेट के अलावा चलने फिरने की कत्तई इजाज़त नहीं, अजब मुसीबत थी. इन हालात में नज्में ग़ज़लें लिखने के आलावा और करता भी क्या. ये नज़्म मेडिकल कालेज के इसी तजरबे और एहसास की तर्जुमान है. [ज़ैदी जाफ़र रज़ा]
धडकनों के पेचो-ख़म का ढूँढने निकला था हल
दफ़अतन झपटे मेरी जानिब दरिन्दाने-अजल
रहमते-यज़दाँ ने लेकिन की हिफ़ाज़त बर-महल
इज़्तिराबे-क़ल्ब ने पाया सुकूने-लायज़ल

इस्तिलाहे-आम में कहते है जिसको अस्पताल
मुद्दतों जिसको समझता आया मैं जाए-क़िताल
सरहदें जिसकी मेरी नज़रों में थीं काँटों का जाल
अब करम-फ़रमा हैं मुझ पर, उसकी आंखों के कँवल

सुब्ह आते ही, छिड़क जाती है अफ़्शां चार सू
नूरो-नगहत, संदलीं साग़र से करते हैं वज़ू
भावनाओ-तल'अतो-फरजाना के जामो-सुबू
नर्मिए-साक़ी से मयनोशी का जारी है अमल

वैसे तो पाबंदियां रहती हैं मुझपर बेशुमार
लब हिलाना जुर्म है, और बोलना ना-साज़गार
दस्तो-पा हैं, फिर भी चलने का नहीं है अख़तियार
खून की रफ़्तार, नब्जों का चलन, बैते-ग़ज़ल

बेडियाँ पैरों में, हाथों में पिन्हा कर हथकडी
कार्डियोग्राफी की लैला, आफतों की फुलझडी
दिन में दो-दो बार मुझको छेड़ती है दो घड़ी
तायरे-आज़ाद को मुश्किल से मिल पाता है कल

नर्मो-नाज़ुक उँगलियों के लम्स से नब्ज़ों के तार
झनझना उठते हैं अज ख़ुद, बे झिझक बे-अख़तियार
साज़े-दिल पर राग बज उठते हैं बालाए-शुमार
ये वो मौसीकी है जिसका कुछ नहीं नेमुल्बदल

मुझको डर है उँगलियों से होके कोई सुर्ख रंग
मेरी नब्ज़ों में न दर आए कहीं मिस्ले-फ़िरंग
और फिर आहिस्ता-आहिस्ता बना ले इक सुरंग
यूँ कहीं तामीर हो जाए न उल्फ़त का महल

मुझको ये जन्नत न रास आएगी तेरी ऐ खुदा
गफ़लत-आगीं वो खुमार आलूद है इसकी हवा
मुझसे कहती है मुहब्बत से मेरे दिल की सदा
ऐ क़लन्दर ! अब यहाँ से चल, यहाँ से दूर चल

जगमगाती शमओं के हर नीम-वा लब को सलाम
सर्व-क़द रौशन दरीचों के हर इक ढब को सलाम
इस म'आलिज-गाह के दीवारोदर सबको सलाम
जा रहा हूँ मैं, कि दिल क़ाबू में है कुछ आज-कल
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1 comment:

Nitish Raj said...

बेडियाँ पैरों में, हाथों में पिन्हा कर हथकडी
कार्डियोग्राफी की लैला, आफतों की फुलझडी
दिन में दो-दो बार मुझको छेड़ती है दो घड़ी

बहुत बढ़िया, कार्डियोग्राफी की लैला, क्या सोच है।।।।