बुधवार, 27 अगस्त 2008

कब कहा मैंने / ज़ैदी जाफ़र रज़ा

कब कहा मैंने कि वो लालो-गुहर मांगता है.
इश्क़ की राह में मुझसे मेरा सर मांगता है.
इस ज़मीं पर नहीं उसकी कहीं कोई भी मिसाल
वो मगर हुस्न परखने की नज़र मांगता है.
शेर-गोई में सभी होते नहीं गालिबो-मीर
ये वो फ़न है जो ख़ुदा-दाद हुनर मांगता है.
एक रफ़्तार से चलते हुए थक जाता है वक़्त
और अफ़्लाक से कुछ ज़ेरो-ज़बर मांगता है.
घर में जब था तो कहा दिल ने कि सहरा में चलो
और सहरा में जब आया तो ये घर मांगता है.
इन्क़लाबात की बातें तो हैं आसान मगर
इन्क़लाबात का रुजहान शरर मांगता है.
ज़िन्दगी उसने मुझे दी है तो है फ़र्ज़ मेरा
उसको लौटा दूँ खुशी से वो अगर मांगता है.
मंजिलें होंगी सब आसान वो गर साथ रहे
उससे बस इतना ही दिल ज़ादे-सफ़र मांगता है
दिल की गहराइयों से निकलें तो कुछ बात बने
मुझसे जाफ़र वो दुआओं में असर मांगता है.
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1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

पढ़वाने का आप को बहुत शुक्रिया.