Thursday, September 18, 2008

हमारे मुल्क की खुफ़िया निज़ामत

हमारे मुल्क की खुफ़िया निज़ामत कुछ नहीं करती।
ये तफ़्तीशें तो करती है, विज़ाहत कुछ नहीं करती।
ये दुनिया सिर्फ़ चालाकों, रियाकारों की दुनिया है,
यहाँ इंसानियत-पैकर क़यादत कुछ नहीं करती।
ज़मीनों से कभी अब प्यार की फ़सलें नहीं उगतीं,
ये दौरे-मस्लेहत है, इसमें चाहत कुछ नहीं करती।
चलो अच्छा हुआ तरके-तअल्लुक़ करके हम खुश हैं,
बजुज़ दिल तोड़ने के ये मुहब्बत कुछ नहीं करती।
तेरी महफ़िल में सर-अफाराज़ बस अहले-सियासत हैं,
वही फ़ाइज़ हैं उहदों पर, लियाक़त कुछ नहीं करती।
खता के जुर्म में हर बे-खता पर बर्क़ गिरती है,
हुकूमत है तमाशाई, हुकूमत कुछ नहीं करती।
महज़ दरख्वास्त देने से, मसाइल हल नहीं होते,
बगावत शर्ते-लाज़िम है, शिकायत कुछ नहीं करती।

******************

2 comments:

nadeem said...

बेहतरीन. आपने लफ्जों में काफी कुछ बयान किया है. काश कुछ लोग इसको समझ पाएं.

Udan Tashtari said...

खता के जुर्म में हर बे-खता पर बर्क़ गिरती है,
हुकूमत है तमाशाई, हुकूमत कुछ नहीं करती।


--बहुत ही उम्दा..बेहतरीन!!