Friday, September 12, 2008

सूरदास के रूहानी नग़मे / शैलेश ज़ैदी [क्रमशः 7]

(43)
जसोदा हरि पालनै झुलावै.
हलारावैं, दुलराइ मल्हावैं, जोइ सोइ कछु गावै.
मेरे लाल कौं आउ निदरिया, काहे न आनि सुवावै.
तू काहे नहिं बेगहि आवै, तोको कान्ह बुलावै.
कबहुं पलक हरि मूँद लेत हैं, कबहुं अधर फरकावै.
सोवत जानि मौन ह्वै के रहि, करि करि सैन बतावै.
इहि अन्तर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरै गावै.
जो सुख 'सूर' अमर मुनि दुर्लभ, सो नन्द भामिनी पावै.


जशोदा पालने में श्याम को झूला झुलाती हैं.
कभी झूले को जुम्बिश दे के होती हैं मगन दिल में,
कभी चुमकारती हैं प्यार से बेटे को झुक झुक कर,
कभी नगमे जुबां पर जो भी आ जाते हैं गाती हैं.
कहाँ है ! नींद तू आजा मेरे बेटे की आंखों में.
सुलाती क्यों नहीं तू लाल को मेरे यहाँ आकर.
अरे तू छोड़कर सब काम जल्दी क्यों नहीं आती.
कन्हैया ख़ुद बुलाते हैं तुझे ऐ बावली आजा.
कभी लोरी को सुनकर श्याम पलकें मूँद लेते हैं.
कभी होंटों को फड़काते हैं महवे-ख्वाब हों जैसे.
समझकर सो रहे हैं श्याम, कुछ लम्हों को चुप रहकर.
लबों पर रखके उंगली सबसे कहती हैं इशारों से.
कोई आहट न हो, टूटे न कच्ची नींद बेटे की.
इसी असना में जब बेचैन होकर श्याम उठते हैं.
जशोदा मीठी-मीठी लोरियां फिर गाने लगती हैं.
खुशी जो 'सूर' वलियों के भी हिस्से में नहीं आई.
मगन हैं नन्द की ज़ौजा वही नादिर खुशी पाकर.
(44)
जसुमति मन अभिलाष करै.
कब मेरो लाल घुटुरुवन रेंगै, कब धरनी पग द्वैक धरै.
कब द्वै दांत दूध कै देखौं, कब तोतरें मुख बचन झरै.
कब नन्दहि 'बाबा' कहि बोलै, कब जननी कहि मोहि ररै.
कब मेरौ अंचरा गहि मोहन, जोइ-सोइ कहि मोसों झगरे.
कब धौं तनक-तनक कछु खैहै, अपने कर सौं मुखहिं भरै.
कब हँसि बात कहैगो मोसों, जा छबि तैं दुख दूरि हरै.
स्याम अकेले आँगन छाँड़े, आपु गई कछु काज धरै.
इहिं अन्तर अंधवाह उठ्यो इक, गरजत गगन सहित घहरै.
'सूरदास' ब्रज-लोक सुनत धुनि, जो जहं-तंह अतिहिं डरै.


दिल में हैं कैसे-कैसे जशोदा के वलवले.
वो दिन कब आये लाल मेरा घुटनियों चले.
कब हो खड़ा वो पाँव जमाकर ज़मीन पर.
कब देखूं उसके दूध के दो दांत खुश-गुहर.
कब तोतली ज़बान में बोले मेरा पिसर.
कब नन्द को पुकारे कहे 'बाबा' प्यार से.
कब मां की रट लगाके परीशां मुझे करे.
मोहन पकडके कब मेरा आँचल झगड़ पड़े.
कब जी में जो भी आये कहे कहके अड़ पड़े.
कब दिन वो आये खाने लगे कुछ ज़रा-ज़रा.
हाथों से अपने लुकमा भरे मुंह में महलका.
कब हंसके मुझसे बात करेगा, रिझायेगा.
कब रूप उसका देखके दुख भाग जायेगा.
तनहा सहन में श्याम को दो पल को छोड़कर.
घर में गयीं जशोदा कोई काम सोंचकर.
इस बीच जाने क्या हुआ तूफ़ान सा उठा.
थी घन-गरज वो, ब्रज का जहाँ थरथरा उठा.
गोकुल के लोग 'सूर', सदा सुनके डर गए.
जो थे जहाँ खड़े रहे, चेहरे उतर गए.
(45)
जननी देखिं छबि बलि जात.
जैसे निधनी धनहिं पाये, हरष दिन अरु रात.
बाल लीला निरखि हरषित, धन्य धनि ब्रज नारि.
निरखि जननी-बदन किलकत, त्रिदस पति दै तारि.
धन्य नन्द, धनि धन्य गोपी, धन्य ब्रज कौ बॉस.
धन्य धरनी-करन-पावन, जन्म सूरजदास.


माँ हुई जाती है कुरबां देखकर हुस्ने-जमील.
जैसे मुफलिस खुश हो बेहद पाके दौलत लाज़वाल.
औरतें गोकुल की हैं सब लायके-सद-इफ्तिखार.
बाल लीला के नजारों से हैं वो बागो-बहार.
माँ का चेहरा देखकर, हंसकर, बजाकर तालियाँ.
श्याम ममता की छुअन से भरते हैं किलकारियाँ.
गोपियाँ भी, नन्द भी, गोकुल के बाशिंदे भी सब.
क़ाबिले-तहसीन हैं, पाकर मताए-हुस्ने-रब.
सारी दुनिया की ज़मीं ऐ 'सूर' पाकीजा हुई.
आमदे मौलूद से हर जा खुशी पैदा हुई.
(46)
किलकत कान्ह घुटुरुवनि आवत.
मनिमय कनक नन्द कै आँगन, बिम्ब पकरिबै धावत.
कबहुं निरखि हरि आप छाहँ कौं, कर सौं पकरन चाहत.
किलकि हंसति राजत द्वै दतियाँ, पुनि-पुनि तिहि अवगाहत.
कनक भूमि पर कर पग छाया, यह उपमा इक राजति.
प्रतिकर, प्रतिपद, प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति.
बाल दसा सुख निरखि जसोदा, पुनि-पुनि नन्द बुलावत.
अंचरा तर लै ढाकि, 'सूर' के प्रभु कौ दूध पियावत.


कन्हैया आ रहे हैं घुटनियों किलकारियाँ करते.
जवाहर से जड़े सोने के आँगन में जशोदा के.
लपकते हैं पकड़ने के लिए परछाईं रह-रहके.
कभी साए को अपने देखकर पुर-शोख आंखों से.
पकड़ना चाहते हैं उसको नाज़ुक नर्म हाथों से.
कभी होकर मगन हंसते हैं जब किलकारियाँ भरकर.
नज़र आते हैं उनके दूध के दांतों के दो गौहर.
ये कोशिश बारहा रखते हैं जारी श्याम खुश होकर.
निगाहों को तरावत बख्शता है ये हसीं मंज़र.
तिलाए-अहमरीं पर दस्तो-पा का देखकर साया.
ख़यालों में ये इक तशबीह का नक्शा उभर आया.
ज़मीं ने हर क़दम, हर हाथ, हर नग में जवाहर के.
क़तारों में कँवल बिठला दिए आरास्ता करके.
ये दिलकश शोखियाँ तिफ़ली की जब देखि जशोदा ने.
बुलाया नन्द को देकर सदाएं माँ की ममता ने.
खुशी से, 'सूर' लेकर श्याम को आँचल के साए में.
पिलाया दूध माँ ने चाँद को बादल के साए में.
(47)
कान्ह चलत पग द्वै-द्वै धरनी.
जो मन में अभिलाष करति ही, सो देखति नन्द धरनी.
रुनुक झुनुक नूपुर पग बाजत, धुनि अतिहीं मन हरनी.
बैठि जात फुनि उठत तुरत ही, सो छबि जाई न बरनी.
ब्रज जुवती सब देख थकित भइ, सुन्दरता की सरनी. .
चिर जीवहु जसुदा कौ नंदन, 'सूरदास' कौ तरनी.


दो-दो क़दम ज़मीन पे चलने लगे हैं श्याम.
कितने दिनों से थी जो यशोदा की आरजू.
तकमील उसकी देख रही हैं वो रू-ब-रू.
रन-झुन सदाएं पाँव के घुंगरू की दिल-फरेब.
मीठी धुनों से जीतता है दिल ये पावज़ेब.
चलते हैं, बैठ जाते हैं, होते हैं फिर खड़े.
मंज़र वो है कि जिसका बयाँ कुछ न बन पड़े.
बेसुध हैं देख-देख के गोकुल की गोपियाँ.
पेशे-नज़र है हुस्न का सर्चश्माए-रवां.
जिंदा रहो हमेशा यशोदा के लाल तुम.
शाफ़े हो 'सूर; के लिए ऐ बाकमाल तुम.
(48)
मैया ! मैं तौ चंद खिलौना लैहौं.
जैहौं लोटि धरनि पर अबहीं, तेरी गोद न ऐहौं.
सुरभी कौ पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहौं.
ह्वैहौं पूत नन्द बाबा कौ, तेरौ सूत न कहैहौं.
आगे आउ बात सुन मेरी, बलदेवहिं न जनैहौं.
हँसि समुझावति; कहति जसोमति, नई दुलहिया दैहौं.
तेरी सौं मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहौं.
'सूरदास' ह्वै कुटिल बराती, गीत सुमंगल गैहौं.


अम्माँ ! फ़क़त वो चंद खिलौना ही लूँगा मैं.
ले देख, मैं ज़मीं पे अभी लोट जाऊँगा.
गोदी में फिर तेरी न किसी तरह आऊंगा.
पीऊंगा दूध गाय का हरगिज़ न जान ले.
गुंथवाऊंगा न चोटी भले तू पड़े गले.
अब सिर्फ़ नन्द बाबा का बेटा रहूँगा मैं.
हूँ तेरा आल ये कभी कहने न दूंगा मैं.
मान बोली आओ पास, मेरी बात तो सुनो.
बलदेव भी न जानेंगे, बस तुम ये जान लो.
हंसकर यशोदा श्याम को समझाके प्यार से.
कहती हैं दूंगी लाके नवेली दुल्हन तुझे.
अम्माँ तुम्हें क़सम है सुनो बात तुम मेरी.
जाऊँगा ब्याहने को दुल्हन मैं इसी घड़ी.
कहते हैं 'सूर' मिलके मैं बारातियों के साथ.
गाने शगुन के गाऊंगा मीठी धुनों के साथ.
(49)
हरि अपनैं आँगन कछु गावत
तनक-तनक चरननि सों नाचत, मनहीं मनहिं रिझावत.
बांह उठाइ काजरी - धौरी, गैयन टेरि बुलावत.
कबहुँक बाबां नन्द पुकारत, कबहुँक घर मैं आवत.
माखन तनक आपने कर ली, तनक बदन मैं नावत.
कबहूँ चितै प्रतिबिम्ब खंभ मैं लौनी लिए खवावत.
दूरि देखति जसुमति यह लीला, हरष अनंद बढ़ावत.
सूर स्याम के बाल-चरित नित, नितही देखत भावत.


अपने आँगन में कुछ गा रहे हैं हरी
नन्हें- नन्हें से पैरों से हैं नाचते
लुत्फ़ अन्दोज़ होते हैं दिल में सभी
बाजुओं को उठाकर बुलाते हैं वो
गायों को नाम ले-ले के उनका कभी
और फिर नन्द बाबा को देकर सदा
पास अपने बुलाते हैं वो नाज़ से
याद आता है जैसे ही फिर और कुछ
घर के अन्दर वो आते हैं दौडे हुए
थोड़ा मक्खन है मुंह में तो है थोड़ा सा
उनके नाज़ुक से नन्हें से हाथों में भी
देखते हैं तिलाई सुतूनों में जब
अपनी परछाईं को जगमगाते हुए
मुस्कुरा कर खिलाते हैं मक्खन उसे
देखती हैं जशोदा तमाशे ये सब
शौक़ से दिल में खुशियाँ समोती हुई
श्याम की उहदे तिफ़्ली की ये शोखियाँ
सूर लगती हैं अच्छी बहोत रोज़ ही.
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1 comment:

सतपाल said...

You are doing a great job to unite the two hindustani languages.
Regards