Monday, September 8, 2008

कबीर की भक्ति का स्वरुप / प्रो. शैलेश ज़ैदी [क्रमशः 2]

1.3. विरहानुभूति की तीव्रता
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने मलिक मुहम्मद जायसी के विरह वर्णन को हिन्दी साहित्य में अद्वितीय बताया है. उनकी दृष्टि प्रभु के प्रेम की चोट से विह्वल कबीर की वरहानुभूति का स्पर्श किए बिना वापस लौट आई. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी यद्यपि यह स्वीकार करते हैं कि " विरह का वर्णन करने में सूफी कवि कमाल करते हैं. इनका लक्ष्य सदा भगवत प्राप्ति रहता है. इसलिए भगवान के विरह में जीवात्मा की तड़पन का ये बड़ी सजीवता के साथ वर्णन करते हैं."(17). पर कबीर साहित्य के विशेषज्ञ होते हुए भी द्विवेदी जी को तड़पन की यह सजीवता कबीर में नहीं दिखायी दी. "बिरहा बुरहां जिनि कहौ, बिरहा है सुलतान" की घोषणा करने वाले कबीर प्रभु प्रेम में तन्मय प्रेमी के लिए विरह को अनिवार्य शर्त मानते हैं -"जिस घट बिरह न संचरै, सो घट जान मसान."
सूफी कवियों की निश्चित मान्यता है कि विरह भावना ही प्रभु प्रेम का सर्वस्व है. अपने मूल से अलग होने का दुःख किसे नहीं होता. मौलाना रूम ने तो अपनी प्रख्यात मसनवी का प्रारम्भ ही बांसुरी की उस पीड़ा भरी शिकायत से किया है जो उसे अपने मूल से वियुक्त होने के कारण है. धरती पर आने से पूर्व मनुष्य की जीवात्मा का ज्योतिमय प्रकाश सर्वोच्च आकश पर शासन करता था. " तू आं नूरे कि पेश अज सुहबते-ख़ास/ विलायत दाश्ती बर बामे-अफ्लाक.(18 )" मौलाना रूम का यह शेर भी द्रष्टव्य है -" मा-ब-फ़लक बूदा एम, यारे-मलक बूदा एम / बाज़ हुमां ज़ादा एम, मंजिले-मा किब्रियास्त." अर्थात हम आकश पर रह चुके हैं, फरिश्तों के मित्र रह चुके हैं. हम फिर वहीं पहुंचेंगे. हमारा गंतव्य प्रभु की परम सत्ता है. अलखदास ने इसी भाव को इन शब्दों में व्यक्त किया है.- "हम निज आए सरग तें, पुनि निज सर्गहि जाहिं." (19 ).
श्रीप्रद कुरआन में कहा गया है - "अल्लज़ीन इज़ा असाबतहुम मुसीबतुन क़ालू इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन" (20 ). अर्थात् ये (प्रभु के प्रेमी) वह लोग हैं की जब उनपर संकट आता है तो कहते हैं हम निस्संदेह अल्लाह ही के लिए हैं और हम उसी की ओर लौटकर जाने वाले हैं. नबीश्री का भी कथन है - "प्रत्येक वास्तु अपने मूल की ओर लौटती है." (21). कबीर ने इसी तथ्य का संकेत अनेक स्थलों पर किया है. कभी वे कहते हैं - "मूलहि मूल मिलाऊंगा." कभी उपदेश देते हैं -" जाका संग तैं बीछुड्या ताहि कै संग लाग" कभी कहते हैं -"बिछुरे तट फिर सहज समाना" और कभी यह सोचकर संतोष कर लेते हैं -"मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा / तेरा तुझको सौंपते, क्या लागे है मेरा". गालिब ने शायद कबीर से ही प्रेरणा लेकर कहा था -"जान दी, दी हुई उसी की थी / हक़ तो ये है कि हक़ अदा न हुआ."(22).
कबीर की रचनाओं में विरह एक भक्त ह्रदय की प्रत्यक्ष अनुभूति है. प्रेमाख्यानक काव्यों के रचयिता इस विरह को अपने कथा पात्रों के माध्यम से व्यक्त करते हैं. तुलसी के रामचरित मानस को यद्यपि प्रेमाख्यानक काव्यों की श्रेणी में नहीं रखा जाता, किंतु वहां भी राम का विरह तुलसी की प्रत्यक्ष अनुभूति का परिणाम नहीं है. रामचरित मानस में राम की विरहानुभूति साधक की है, साध्य की नहीं. तुलसी जिस समय 'कामिहि नारि पियारि जिमि' की बात करते हैं तो वहाँ साधक पुरूष ही दिखायी देता है. वासुदेवशरण अग्रवाल की मान्यता है कि 'ईश्वर को प्रेमिका मानकर उसके लिए जीवन की आकुलता का वर्णन बैष्णव, सहजयान, सूफी मत या ईसाई मत सब की विशेषता है.' (23). किंतु सूफी मुक्तक काव्य में पुरूष ही सर्वत्र साध्य है और साधक सर्वत्र स्त्री है. फिर सूफी मुक्तक काव्यों में विरह का मात्र वर्णन नहीं किया जाता. उसमे विरह की प्रत्यक्षानुभूति की अभिव्यक्ति मिलती है.विरह यहाँ कवि कल्पना न होकर स्वयं भोगा हुआ सत्य है. कदाचित इसीलिए इसका प्रभाव भी अधिक गहरा है.
कबीर इस तथ्य से परिचित हैं कि जिसने भी प्रभु रुपी प्रियतम को प्राप्त किया, उसने विरह की मर्मानुभूति के फलस्वरूप आंसू बहाकर ही उसे प्राप्त किया -"हँसि-हँसि कंत न पाइए, जिन पाया तिन रोइ" अथवा "बिन रोयाँ क्यूँ पाइए, प्रेम पियारा मित्त" और यह रोना क्षण दो क्षण का नहीं है - रात्यूं रूनी बिरहनी, ज्यूँ बंचौ कूँ कुंज". किंतु रात-रात भर रोने मात्र से सच्चे प्रेमी की पहचान नहीं की जा सकती. जबतक आंखों से रक्त की बूँदें न टपक पड़ें, कैसे जाना जा सकता है कि यह अपने प्रियतम का सच्चा प्रेमी है - "सोई आंसू सज्जणा , सोई लोक बिडाहि / जे लोइण लोही चुवै, तौ जानौ हेत हियांहि" ग़ालिब ने कबीर के इन भावों का लगभग अनुवाद सा कर दिया है -'रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल / जो आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है.' (24).
हाफिज़ शीराजी की दृष्टि में प्रियतम के विरह का दुःख प्रेमी की आंखों से नींद उड़ा देता है और वह शमा कि भाँती निरंतर आंसू बहता रहता है - "रोज़ो-शब ख्वाबम नमी आयद बचश्मे-ग़म-परस्त / बस कि दर बीमारिए-हिजरे-तू गिरियानम चु शमअ"(25).
कबीर भी विरह की मर्मानुभूति के प्रभाव से रोते और जागते रहते हैं -"दुखिया दस कबीर है, जगाई अरु रोवै" देखा जाय तो कबीर की विरहानुभूति की तीव्रता नाबीश्री हज़रत याकूब का स्मरण दिला देती है जो हज़रत यूसुफ़ के आने की राह देखते-देखते आंखों की रोशनी खो बैठे थे और हर समय हज़रत यूसुफ़ का नाम पुकारते-पुकारते उनकी जीभ छालों से भर गई थी - "अंखडियाँ झाईं पड़ी, पंथ निहारि-निहारि / जीभडियाँ छाला पड्या, नाम पुकारि-पुकारि."
मलिक मुहम्मद जायसी ने प्रेम के मार्ग में विरह की अग्नि और रस की मधुरता का साथ-साथ निर्वाह करने का प्रयास किया है. कबीर की रचनाओं में भी प्रेम की यह दोनों ही अवस्थाएं एक साथ देखी जा सकती हैं. हाफिज़ शीराज़ी का ह्रदय पलकों के छोटे-छोटे तीरों से लहूलुहान होने के बाद भी प्रियतम की भावों के तरकश का इच्छुक है. जैसे घायल होने में भी पीड़ा की रसानुभूति का एक अनूठा आनंद हो - "दिल कि अज़ नावके-मिज़गाने-तू दर खूँ मी गश्त / बाज़ मुश्ताक़े-कमाँखानए-अब्रूए तू बूद" (26). कबीर भी प्रेम के शर की चोट खाकर मगन दिखाई देते हैं -"मन भय मगन प्रेम सर लागा." इतना ही नहीं -"जिहि सरि मारी काल्हि, सो सर मेरे मन बस्या / तिहि सर अजहूँ मार, सर बिन सच पाऊं नहीं." द्रष्टव्य यह है कि विरह का यह शर मर्मान्तक चोट करता है और कलेजे तक को बेध देता है - "लागी चोट मरम्मि की, गई कलेजा छांडि." व्यथित कर देने वाली विरह के शर की चोट से कबीर का सम्पूर्ण शरीर जर्जर हो गया है. किंतु कबीर की इस व्यथा के रहस्य या तो वह जानता है जिसने यह शर चलाया है या कबीर जानते हैं जिनके ह्रदय के भीतर यह बिंधा हुआ है - "चोट सताणी बिरह की, सब तन जर-जर होइ / मारणहारा जानिहै, कै जिहिं लागी सोइ."
प्रभु प्रेम में विरहानुभूति की जितनी संभावित स्थितियां हो सकती हैं कबीर उन सभी मोडों से सहज भाव से गुज़र चुके हैं. संजीवनी बूटी की खोज में पर्वत-पर्वत भटकने वाले कबीर (पर्बति-पर्बति मैं फिरया, नैन गंवाए रोई / सो बूटी पाऊं नहीं, जातें जीवन होई), प्रभु प्रेम का रसायन प्राप्त करके उसके आस्वादन से सम्पूर्ण शरीर को कंचन के सामान शुद्ध बना लेते हैं. ठीक वैसे ही जैसे हाफिज़ शीराज़ी करते हैं "कीमियाए-गमे-इश्के-तू तने-खाकी रा / जरे-खालिस कुनद हरचंद बुवद हम चु रसास." अर्थात् - तेरे प्रेम की पीड़ा का रसायन मेरे मिटटी के शरीर को शुद्ध स्वर्ण बना देता है भले ही यह शरीर रांगे की तरह रहा हो. किंतु शरीर का निरंतर क्षीण होना, शरीर के भीतर दावाग्नि सी फूटना, विरह रुपी भुवंगम का शरीर में प्रवेश करके कलेजे पर चोट करना और उसे खाने का प्रयास करना, शिराओं की तंत्री और शरीर के रबाब पर विरह का वाद्य छेड़ना, शरीर के दीपक, प्राणों की वर्तिका और रक्त के तेल से विरह की ज्योति को प्रज्ज्वलित रखना कबीर के आध्यात्मिक जगत की उपलब्धियां हैं. विरह ने कबीर को जीवन और मरण के बीच खड़ा कर दिया है. फिर भी प्रभु मिलन की आशा निरंतर बनी रहती है. मलिक मुहम्मद जायसी भ्रमर और काग के माध्यम से "सो धनि बिरहै जरि मुई, तेहिक धुंआ हम लाग." का समाचार प्रियतम तक भेजने की व्यवस्था करते हैं जबकि कबीर अपने और प्रियतम के बीच किसी माध्यम की अपेक्षा नहीं रखते. वह अपने शरीर को विरहाग्नि में जलाकर राख कर देना चाहते हैं ताकि इस आग का धुंआ सीधे स्वर्ग में जाकर प्रियतम की आंखों को सजल कर दे और उन आंसुओं की वृष्टि का स्पर्श पाकर विरहाग्नि ठंडी पड़ जाय -"यह तन जालौं मसि करूं, धूआँ जाइ सरग्गि / मति वै राम दया करैं, बरसि बुझावैं अग्गि."
1.4. मरजीवा भाव
फारसी तथा हिन्दी के सूफी कवियों की रचनाओं में 'मरजीवा' अथवा 'मर्जीया' का विशेष महत्त्व है. इन कवियों ने 'मरजीवा' के सूत्र श्रीप्रद कुरआन तथा हदीस (नाबीश्री के कथ्य) से लिए हैं. हिन्दी आलोचकों ने इस शब्द की मूल चेतना को समझे बिना अपने स्वभावानुरूप अटकलें लगाने का प्रयास किया है. डॉ. विजयेन्द्र स्नातक इस प्रसंग में लिखते हैं - "मरजीवा शब्द का प्रयोग सागर की गहराई में बैठकर मोटी खोज निकने वाले के लिए होता है. वही संत वाणी में चिंतन साधना के बल पर संसार सागर से ज्ञान-रत्न प्राप्त करने वाले साधक के लिए हुआ है." (27). वासुदेवशरण अग्रवाल ने 'मर्जीया' को समझने का कुछ प्रयास अवश्य किया है. वे सहजयान मार्ग में योगी के महासुख चक्र में प्रवेश करने की स्थिति को मर्जीया भावः स्वीकार करते हैं जहाँ मृत्यु का स्पर्श नहीं है. वे इखते हैं -" मर्जीया की अवस्था तक पहुँचने के लिए पहले मरण अर्थात रूप लोक का अभाव आवश्यक है. यह 'मर-जिया' अर्थात मरकर फिर जीवित होने की अवस्था है. दूसरे शब्दों में कहा जाय तो महासुख चक्र या सुखवासी में मृतु का स्पर्श नहीं है."(28).
स्पष्ट है की वासुदेवशरण जी ने सहजयान मार्ग की ज्ञानमूलक साधना को आधार बनाकर 'मर्जीया' भाव को व्याख्यायित किया है. पदमावत के कथा-सन्दर्भ से उनकी व्याख्या तर्क-सम्मत भी हो सकती है. किंतु फ़ारसी तथा हिन्दी के मुक्तक सूफी काव्य में प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम की स्थिति ही भक्त के ह्रदय में मरजीवा भाव उतपन्न करती है. हाफिज़ शीराजी की तो दृढ़ आस्था है कि "हरगिज़ न मीरद आंकि दिलाश जिंदा शुद बिइश्क़" अर्थात् - जिसका ह्रदय प्रेम की अनन्यता से जीवित हो गया हो वह कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं करता. "हम न मरें मरिहै संसारा / हमकौ मिला जियावण हारा" तथा "राम रमें रमि जे जन मुवा / कहै कबीर अबिनासी हुवा." के माध्यम से कबीर ने इसी तथ्य की अभिव्यक्ति की है. यहाँ ज्ञानमूलक साधना का कोई आधार नहीं है.
सूफियों के यहाँ मरजीवा भाव की प्रेरणा श्रीप्रद कुरआन की इन आयतों से मिलती है - "फ़क़ाल लहुमुल्लाहु मूतू सुम्म अहयाहुम"(29) अर्थात् - अल्लाह ने उनसे कहा कि मर जाओ (और जब वे मर गए) पुनः उनको जीवित कर दिया. अन्य आयत भी द्रष्टव्य है - "वला तह्सबन्नल्लज़ीन क़तेलू फ़ी सबीलिल्लाहि अमवातन बल अहयाउन इन्द रब्बिहिम यूरज़क़ून" (30). अर्थात् जो लोग प्रभु प्रेम के मार्ग में मारे गए उन्हें मृत न समझो बल्कि वे अपने रब के साथ जीवित हैं और रोज़ी पा रहे हैं.
मरजीवा भाव को लेकर सूफी जगत में नबीश्री की यह हदीस अत्यधिक लोकप्रिय है -"मूतू क़ब्ल इन्न तुमूतू" (31). अर्थात् मर जाओ इससे पहले कि तुम्हें मौत आये. ख्वाजा अत्तार इस मृत्यु को अंहकार से विमुख होकर उससे पूर्णतः विमुक्त हो जाने की स्थिति मानते हैं और परम सत्ता के साथ एकमेक हो जाने को जीवित रहना स्वीकार करते हैं जिससे कि फ़ना की स्थिति में पूर्ण अमरत्व प्राप्त हो जाय.(32) कबीर के समकालीन सूफी कवि अलखदास ने मरजीवा भाव को और भी स्पष्ट कर दिया है –“मूए ते जिउ जाय जहाँ / जीवत ही लै राखो तहाँ / जियते जियरे जो कोऊ मुआ / सोई खेलै परम निसंक हुआ."
मलिक मुहम्मद जायसी ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा है - "मुहमद जियतहि जे मुए, तिन पुरूषन्ह कह साधु" बाबा फरीद सजदे की स्थिति में पढ़ा करते थे - "अज़ बहरे तू मीरम ज़ बराए तू ज़ियम" अर्थात् मैं तेरे लिए ही मरता हूँ और तेरे लिए ही जीवित हूँ. प्रसिद्ध सूफी हसन बसरी (642 -728 ई0) ने इसी मरजीवा भाव को सच्ची मृत्यु के रूप में मान्यता दी है. (33). साधना मार्ग में वासुदेवशरण अग्रवाल ने मर्जीया भाव को जिस रूप में प्रस्तुत किया है सूफी परम्परा में निश्चित रूप से उसका वह स्वरुप नहीं है. यहाँ मरजीवा भाव की बुनियाद में प्रेम की वह गहराई है जहाँ आशिक सांसारिकता की ओर से स्वयं को मार लेता है और प्रियतम के प्रति पूर्णतः समर्पित रहकर जीवित रहता है. कबीर इसी परम्परा को स्वीकार करते हैं. कबीर जानते हैं कि मरजीवा भाव को प्राप्त करना सरल नहीं है. इसलिए उनकी मान्यता है कि जो इस प्रकार मरना जानता है उसे फिर कभी मृत्यु प्राप्त नहीं होती - "जाणि मरै जे कोई, तौ बहुरि न मरणा होई" इस मृत्यु की वास्तविक स्थिति क्या है स्वयं कबीर से सुनिए - "जामें हम सोही हमही में, नीर मिलै जल एक हुवा / यौं जानै तो कोई न मरिहै, बिन जानें पै बहुत मुवा" इसी लिए कबीर सुझाव देते हैं -"जीवन थें मरिबौ भलो, जे मरि जानै कोई / मरने पहिले जे मरै, कलि अजरावर होई" अंत में कबीर स्पष्ट शब्दों में घोषणा करते हैं – “कबीर ऐसे मरि मुवा, बहुरि न मरना होई."
2.1. साधना मूलक ज्ञान
कबीर काव्य में जहाँ प्रभु के प्रति प्रेम की अनन्यता पर बल दिया गया है वहीं सहजयान मार्ग और शैव मतानुयायी नाथयोगियों से प्राप्त साधनामूलक ज्ञान का महत्त्व भी कुछ कम नहीं है. ऐसा प्रतीत होता है की कबीर प्रेममूलक भक्ति और साधानामूलक ज्ञान को एक दूसरे का पूरक मानते हैं. मलिक मुहम्मद जायसी और हिन्दी के अन्य सूफी कवियों के यहाँ भी यही स्थिति देखी जा सकती है. कबीर के समकालीन सूफी कवि अलखदास (शेख अब्दुल-कुद्दूस गंगोही) ने तो रुश्दनामा शीर्षक ग्रन्थ की रचना ही इसी उद्देश्य से की थी. इस ग्रन्थ की विशेषता यह है कि इसमें एकत्ववाद (वह्दतुल-वुजूद) के सिद्धांतों का दार्शनिक विवेचन करने के साथ-साथ सिद्धों और नाथयोगियों के साधनामूलक ज्ञान का तसव्वुफ़ के साथ सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया गया है.
नाथ-पंथ के प्रसंग में डॉ. कल्याणी मल्लिक की यह अवधारणा विचारणीय है कि "नाथ योगी जो मूलतः शैव थे, उनका पंथ बौद्ध, शाक्त और वैष्णव मतों के पतनोपरांत जिनमें निजी तत्वों का प्राधान्य था, इस्लाम के साथ-साथ उसके पहलू-ब-पहलू विकसित हुआ" (34). गोरखबानी में 'काजी', 'मुलां' (14), 'पीर,' तकबीर,' महमद,'षुदाई', (118), 'अलह' (182), 'पैकम्बर' (225),कलमा (11) आदि इस्लामी शब्दों का प्रवेश तथा बख्तियार काकी, निजामुद्दीन औलिया, बाबा फरीद आदि प्रख्यात भारतीय सूफियों के बीच उलटी साधना (चिल्लाए माकूसा) का प्रचलन, डॉ. कल्याणी मल्ल्लिक की अवधारणा की पुष्टि करता है.
संत साहित्य के आलोचक ऐसे अनेक तथ्यों को दबा जाते हैं जिनके प्रकाश में स्वस्थ एवं निष्पक्ष निष्कर्षों तक पहुँचने की संभावनाएं बनती हैं. गोरखनाथ ने अपना परिचय देते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा था - "उत्पति हिन्दू, जरणां जोगी, अकलि परि मुसलमानी" ( गोरखबानी,14 ). अर्थात् - हिन्दू परिवार में जन्म लेने के कारण वे उत्पत्ति से हिन्दू हैं, वेश से योगी हैं और विवेक उन्होंने मुसलमानों से प्राप्त किया है. एक अन्य स्थल पर उन्होंने कहा है कि ‘ऐ काजी ! प्रत्येक क्षण ज़बान से मुहम्मद का नाम लेने से क्या लाभ, जबकि मुहम्मद जैसे आचरण न हों ? मुहम्मद का ध्यान करना सरल नहीं है. कारण यह कि मुहम्मद जिस छुरी का प्रयोग करते थे वह लोहे अथवा स्पात की नहीं थी, अपितु शब्द की छुरी थी जिससे वे भक्तों के अहं भाव को मारते थे और प्रभु के ज्ञान से उन्हें जीवन प्रदान करते थे. ऐ इस्लामी धर्म-विधान के प्रकाश में न्याय करने वालो ! तुम इस भ्रम में मत रहो कि तुम उस मुहम्मद का प्रतिनिधित्व करते हो. तुम्हारे शरीर में वह आत्मिक बल नहीं है, जो मुहम्मद में था. कलमा (नहीं है कोई उपास्य, अल्लाह के अतिरिक्त) का उपदेश देने वाला मुहम्मद अपने जीवन काल में ही संसार की विषय-वासनाओं के लिए मर चुका था." (35). स्पष्ट है कि गोरखनाथ से लेकर कबीर तक हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच एक-दूसरे से कुछ सीखने और उनकी कथनी और करनी के विरोध पर खुलकर प्रहार करने की एक स्वस्थ परम्परा थी.
प्राचीन भारतीय साधना मार्ग में गगन दृष्टि, उलटी दृष्टि, और उलटी साधना आदि का विशेष महत्त्व था. शशिभूषण दास गुप्त ने लिखा है कि -" नाथ योगियों में उल्टी साधना का पर्याप्त प्रचार था. इसे उजान साधना भी कहा जाता था. चित्त की जो अधोमुखी वृत्तियाँ हैं उनसे उन्हें हटाकर उदू-यान अथा ऊर्ध्व मार्ग में लगाना ही उल्टी साधना का लक्ष्य था. सूफियों ने भी इसे स्वीकार किया था.(36) कबीर के समकालीन सूफी साधक एवं कवि अलखदास की उल्टी साधना में गहरी आस्था थी. वे इशा (रात की नमाज़) के बाद किसी निर्जन स्थान में जाकर रात भर इसका अभ्यास करते थे.(37) सूफी लोग इसे 'चिल्लए माकूस' कहते थे. बख्तियार काकी ने अपने शिष्य बाबा फरीद को इस उल्टी साधना का ज्ञान दिया था. साथ में यह चेतावनी भी दी थी कि इस साधना से मिलने वाली ख्याति से बचना चाहिए. इस साधना के लिए बाबा फरीद रात की नमाज़ के बाद रस्सी का एक सिरा पाँव में और दूसरा ऊपर पेड़ की डाल में बाँध कर कुँए में लटक जाते थे. उस समय शरीर का सारा रक्त आंखों में आ जाता था. इस स्थिति में सारी रात तपस्या करते थे. (38) शेख निजामुद्दीन औलिया ने, जिनकी इस साधना में गहरी आस्था थी, शेख अबू सईद अबिल खैर के एक वक्तव्य के आधार पर लिखा है कि हज़रात मुहम्मद ने भी यह साधना की थी. (39) इन तथ्यों के प्रकाश में सहज ही यह निष्कर्ष निकला जा सकता है कि कबीर की रचनाओं में संदर्भित साधनामूलक ज्ञान उन्हें नाथ योगियों की गोष्ठियों में बैठने मात्र से प्राप्त नहीं हुआ था. उन्होंने स्वयं भी सहजयानी एवं नाथ योगी साधना का अभ्यास किया था.
कबीर की रचनाओं में जिन साधनामूलक प्रतीकों का प्रयोग हुआ है उनके आधार पर इस क्षेत्र में कबीर की गहरी पैठ का अनुमान किया जा सकता है. कबीर ने परम सत्ता को राम, अलह, अलख, निरंजन, ओंकार, बिष्नु, ठाकुर, साहब, गोरख, गोबिंद, हरि, मीरां, खुदाइ, केशव, रहमान, करता, करीम, कृस्न, गोपाल, महादेव, खालिक, माधव, मदसूदन, मुरारी, सिरजनहार जैसे अनेक शब्दों से स्मरण किया है. मध्य युग के किसी एक कवि के यहाँ परम सत्ता के इतने नाम नहीं देखे जा सकते. इनमें निरंजन तथा ओंकार, नाथपंथियों के लोकप्रिय शब्द हैं जिनका प्रयोग कबीर के बहुत बाद तक संत साहित्य में उपलब्ध है. गोरखनाथ ने उस योगी को जो सबके साथ अभेद रखते हुए निर्लिप्त रहता है और माया का खंडन करता है निरंजन की काया कहा है. अन्य स्थल पर -"सोई निरंजन डाल न मूल" के माध्यम से इसे नाथपद का पर्याय भी माना है.
कबीर ने "अलख निरंजन लखै न कोई / निरभै निराकार है सोई," "अलह अलख निरंजन देव / किहि बिधि करौं तुम्हारी सेव," "राम निरंजन न्यारा रे," "वहाँ न ऊगै सूर न चंद / आदि निरंजन कर आनंद," "एक निरंजन अलह मेरा" तथा "अंजन अलख निरंजन सार" आदि पंक्तियों में इसी भाव को व्यक्त किया है और इसमें नाथपंथियों का सीधा प्रभाव देखा जा सकता है. ओंकार अथवा ऊँकार शब्द का प्रयोग कबीर काव्य में एकाध स्थलों पर ही हुआ है. "ऊँकार आदि है मूला / राजा परजा एकहि सूला" तथा "अंजन उत्पति वो ऊँकार" जैसे प्रयोग नहीं के बराबर हैं. किंतु कबीर ने निरंजन तथा ऊँकार के अर्थ में कोई अन्तर नहीं किया है.
कबीर जिसे सच्चा योगी अथवा साधक समझते हैं वह शून्यस्थल पर पहुंचकर वहाँ स्रवित होने वाले अमृत का पान करता है. ब्रह्म रंध्र अथवा गगन मंडल में उसका स्थायी निवास है. वह उन्मनि अवस्था द्बारा इस गगन मंडल में पहुंचकर अमृत रस का आनंद लेता है. उन्मनि अवस्था और सहजावस्था कबीर के यहाँ लगभग समानार्थक है. मूलाधार चक्र से कुण्डलिनी जागृत होकर सुषुमाना के माध्यम से ऊर्ध्वगामी हो सहजावस्था में प्रवेश करती है. चन्द्र-सूर्य, गंगा-यमुना, उल्टा पवन, उलटी गंग, जोगिणी, गोरख, सुरति, निरति, त्रिकुटी संगम, षटदल कँवल, अष्ट कँवल दल, द्वादश कँवल दल, शून्य गुफा से अमृत स्रावण, षोडष कँवल दल, विशुद्ध चक्र आदि साधनामूलक प्रतीकों का प्रयोग कबीर काव्य में नाथ योगी परम्परा के अनुकूल ही हुआ है. ‘परम पद’ के लिए कबीर की रचनाओं में 'हरि पद', 'अभय पद', 'निर्वाण पद', जैसे प्रतीकों का प्रयोग भी पर्याप्त संख्या में उपलब्ध है. स्पष्ट है कि कबीर की भक्ति को समझने के लिए प्रभु के प्रति उनके अनन्य प्रेम की समझ के साथ-साथ उनके साधनामूलक ज्ञान की समझ भी अनिवार्य है.
2.2. पुस्तकीय ज्ञान का तिरस्कार
सूफी कवियों की परम्परा में कबीर ने भी पुस्तकीय ज्ञान को तुच्छ एवं हेय ठहराया है. "गुह्य (Esoteric) एवं अन्तर ज्ञानात्मक (Intiutine) होने के कारण सूफी मत में जो महत्त्व 'मारिफ़त' (प्रभु भक्ति अथवा प्रभु भक्ति का प्रेरक दैवी ज्ञान) का है वह पुस्तकीय ज्ञान का नहीं है. मारिफ़त को मस्तिष्क द्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता. यह एक ऐसा दैवी प्रकाश है जिसकी चमक से प्रभु के प्रियजनों का ह्रदय जगमगा उठता है." (40). सूफी कवि मंझन दैवी ज्ञान अथवा मारिफ़त को महारस कहते हैं. उनकी दृष्टि में दैवी ज्ञान ह्रदय द्वारा ही प्राप्य है और इसके प्रकाश के समक्ष सैकड़ों सूर्य भी फीके पड़ जाते हैं (मधुमालती, 20-21). "मारिफ़त से परम सत्ता की अनुभूति होती है." (41). जबकि पुस्तकीय ज्ञान अंहकार को जन्म देता है. जायसी ने कहरानामा में लिखा भी है -"बुधि बिदिया के कटक मो है मैं का विस्तार". महमूद शाबिस्तरी की दृष्टि में पुस्तकीय ज्ञान एक ऐसी मूर्खता है जो मनुष्य को तर्क-वितर्क की जंजीरों में जकड देती है. जामी की भी अवधारण है कि धार्मिक पाठशालाओं से प्राप्त होने वाली विद्या को मूर्खों के लिए छोड़ देना चाहिए. (42).
कबीर की दृष्टि में न पवित्र वेड झूठा है और न ही श्रीप्रद कुरआन -"बेद कतेब कहौं क्यों झूठा, झूठा जोनि बिचारै." एक अनादी के हाथ में यदि तलवार थमा दी जाय, तो वह अपने ही हाथ पैर काट लेता है. यही स्थिति पंडितों और मुल्लाओं की है. कदाचित इसीलिए कबीर को खुलकर कहना पड़ा - "ब्राह्मण गूरू जगत का, साधू का गुरु नाहिं / उरझि पुरझि करि मरि रह्या, चारिउं बेदा माहिं." यहाँ उरझि-पुरझि से अभिप्राय पुस्तकीय ज्ञान से प्राप्त बौद्धिक विवादों की गुत्थियों से उलझे रहने से है. ऐसे ग्यानी अल्प ज्ञान वाले मनुष्यों के बीच ही अपनी ज्ञानात्मक उपलब्धियों पर गौरवान्वित हो सकते हैं. पर जब दैवी ज्ञान (मारिफ़त) से ह्रदय को प्रकाशित रखने वाला साधू उनके समक्ष आ जाता है तो उनका प्रकाश विलुप्त हो जाता है -"तारा मंडल बैसि करि, चंद बडाई खाई / उदय भय जब सूर का, स्यूं तारा छिपि जाई" सच्चा पांडित्य हृदयस्थ दैवी ज्ञान से ही प्राप्त होता है जो प्रभु के प्रति अनन्य प्रेम की दीप-शिखा से प्रकाशित रहता है. इस पांडित्य को प्राप्त करना सरल नहीं है - "पोथी पढि-पढि जग मुवा, भया न पंडित कोय" अपने पांडित्य का बखान करने वालों की स्थिति तो यह है - "पढि-पढि पंडित बेद बखानैं , भीतर हुती बसत न जानैं"
मलिक मुहम्मद जायसी की भांति कबीर भी मानते हैं कि पढ़ने और गुनने से मनुष्य में अंहकार जन्म लेता है-"पढ़े-गुने उपजै अहंकारा" कबीर मनुष्य के ह्रदय में प्रभु प्रेम की पीड़ा देखने के पक्षधर हैं. उन पुस्तकों को कबीर के विचार से बहा देना चाहिए जो इस पीड़ा को उत्पन्न करने में असमर्थ हैं. "कबीर पढिबा दूरी कर, पुस्तक देइ बहाइ" पढ़ने-गुनने से मनुष्य जो ज्ञान प्राप्त करता है वह सहज साधना से कबीर ने सहज ही प्राप्त कर लिया है-"पढ़े-गुने मति होई / सहजै पाया सोई." मुल्ला की स्थिति भी पंडित से भिन्न नहीं है. श्रीप्रद कुरआन तथा अन्य धार्मिक ग्रंथों को पढ़कर भी वह सांसारिक चिंताओं से मुक्त नहीं हुआ."कुरानाँ कतेबां अस पढि-पढि फिकिर या नहीं जाई" अल्लाह जो दीन का मालिक है उसने कुरआन में हर प्रकार की ज़ोर-ज़बरदस्ती का विरोध किया है - "अलह अवलि दीन का साहिब, जोर नहीं फुरमाया." किंतु मुल्ला और काजी कुरआन पढ़कर भी ज़ोर-ज़बरदस्ती करते हैं और निर्धन-मिस्कीन को सताने से नहीं डरते- "जोर करें मिस्कीन सतावैं. मेरी दृष्टि में कबीर की भक्ति को इन सभी पृष्ठभूमियों में देखा-परखा जाना चाहिए.
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सन्दर्भ :
(17). डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी, हिन्दी साहित्य की भूमिका[बंबई 1954], पृ0 56
(18). अलखबानी [रुश्दनामा का अनुवाद भाग], पृ0 45
(19). वही
(20). श्रीप्रद कुरआन, 2 /156
(21). इब्ने-माजा, मुक़ाम, 199
(22). दीवाने-गालिब, पृ0 40
(23). पदमावत (सं).वासुदेवशरण अग्रवाल, (प्राक्कथन,)पृ0 73-74
(24). दीवाने-गालिब, पृ0 92
(25). दीवाने-हाफिज़, [दिल्ली], पृ0 269
(26). वही, पृ0 152
(27). डॉ. विजयेन्द्र स्नातक, कबीर वचनामृत [नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली), पृ0 96
(28). पदमावत (सं0) वासुदेवशरण अग्रवाल, प्राक्कथन, पृ0 67
(29). श्रीप्रद कुरआन, सूरह अल-बक़रा, आयत 243
(30). वही, सूरह आलि इमरान, आयत 169
(31). अलखबानी, रुश्दनामा का अनुवाद भाग, पृ0 40
(32). वही
(33). मारग्रेट स्मिथ, ऐन अर्ली मिस्टिक आफ बग़दाद [कैम्ब्रिज 1928], पृ0 69
(34). डॉ. कल्याणी मल्लिक, सिद्ध सिद्धांत पद्धति एंड द वर्क्स आफ द नाथ योगीज़, [बंबई 1954], पृ0 7
(35). डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल (सं.) गोरखबानी [प्रयाग 2017 वि.], पृ0 4-5
(36). डॉ. शशिभूषण दास गुप्त, आब्स्क्योर रेलिजस कल्ट्स, पृ0 256
(37). अलखबानी, प्रस्तावना भाग, पृ0 84
(38). अमीर खुर्द, सियारुल औलिया, पृ0 70
(39). हसन निजामी, फ़वायदुल फुवाद, पृ0 8-9
(40). इन्साइक्लोपीडिया आफ़ रेलिजन एंड एथिक्स, खंड 8, पृ0 277
(41). डॉ. रोमा चौधरी, सूफ़िज़्म एंड वेदान्त, वाल्यूम 2, पृ0 48(42). आर. पी. मसानी, द कांफ्रेंस आफ बरड्स, [1914] पृ0 19-20

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