Saturday, September 20, 2008

किसी-किसी की तरफ़ / रईस फ़रोग

किसी-किसी की तरफ़ देखता तो मैं भी हूँ।
बहोत बुरा न सही, पर बुरा तो मैं भी हूँ।
खरामे-उम्र तेरा काम पायमाली है,
मगर ये देख तेरे ज़ेरे-पा तो मैं भी हूँ।
बहोत उदास हो दीवारों-दर के जलने से,
मुझे भी ठीक से दखो, जला तो मैं भी हूँ।
तलाशे-गुम्शुदागां में निकल तो सकता हूँ
मगर मैं क्या करूँ खोया हुआ तो मैं भी हूँ।
ज़मीं पे शोर जो इतना है सिर्फ़ शोर नहीं,
कि दरमियाँ में कहीं बोलता तो मैं भी हूँ।
अजब नहीं जो मुझी पर वो बात खुल जाए,
बराए नाम सही, सोचता तो मैं भी हूँ।

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1 comment:

Udan Tashtari said...

रईस फरोग साहेब को पढ़कर अच्छा लगा..आपका बहुत आभार!!