Monday, September 22, 2008

शह्र-शह्र सन्नाटे / खालिद अहमद

शह्र-शह्र सन्नाटे, यूँ सदा को घेरे हैं।
जिस तरह जज़ीरों के, पानियों में डेरे हैं।
नींद कब मयस्सर है, जागना मुक़द्दर है,
जुल्फ़-जुल्फ तारीकी, ख़म-ब-ख़म सवेरे हैं।
इश्क क्या, वफ़ा क्या है, वक़्त क्या, खुदा क्या है,
इन लतीफ़ जिस्मों के, साए क्यों घनेरे हैं।
हू-ब-हू वही आवाज़, हू-ब-हू वही अंदाज़,
तुझको मैं छुपाऊं क्या, मुझ में रंग तेरे हैं।
तोड़कर हदे-इमकां, जायेगा कहाँ इर्फां,
राह में सितारों ने, जाल क्यों बिखेरे हैं।
हम तो ठहरे दीवाने, बस्तियों में वीराने,
अहले-अक़्ल क्यों खालिद, पागलों को घेरे हैं।
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3 comments:

परमजीत बाली said...

इश्क क्या, वफ़ा क्या है, वक़्त क्या, खुदा क्या है,
इन लतीफ़ जिस्मों के, साए क्यों घनेरे हैं।
हू-ब-हू वही आवाज़, हू-ब-हू वही अंदाज़,
तुझको मैं छुपाऊं क्या, मुझ में रंग तेरे हैं।

बहुत बढिया!

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन!!खालिद अहमद साः को पढ़वाने का आभार.

मीत said...

हम तो ठहरे दीवाने, बस्तियों में वीराने,
अहले-अक़्ल क्यों खालिद, पागलों को घेरे हैं।

sahi hai. Lekin kya karen haqeeqat yahii hai. bahut khoob.