मंगलवार, 9 मार्च 2010
मिली है जो भी हमें ज़िन्दगी ग़नीमत है
गंगाजल की क़समें खा लें।
सोमवार, 8 मार्च 2010
हवा का रुख़ बदल जाता है अक्सर
रविवार, 7 मार्च 2010
तवील होती हैं क्यों आजकल शबें बेहद
ज़िकरे रोज़ो-शब करता हूं
शनिवार, 6 मार्च 2010
तवील होता है जब इन्तेज़ार सोचता हूं
शुक्रवार, 5 मार्च 2010
दिल की बातें बे मानी हैं
सदाएं देता है दरिया के पार से मुझ को
गुरुवार, 4 मार्च 2010
ख़ेज़ाँ के ज़ुल्म से पूरा शजर बरहना था
बुधवार, 3 मार्च 2010
बहोत भीनी हो जो ख़ुश्बू किसे अच्छी नहीं लगती।
मंगलवार, 2 मार्च 2010
हाँ तबीअत आजकल मेरी परीशाँ है बहोत्
अहसास के तमग़े लिए
शनिवार, 27 फ़रवरी 2010
शुभकामना
गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010
नारीजन्य-अनुभूति की उर्दू कवयित्री शाइस्ता जमाल / शैलेश ज़ैदी
हवा है तेज़ बहोत राह चलना मुश्किल है
युग-विमर्श की यात्रा के दो वर्ष
बुधवार, 24 फ़रवरी 2010
हूं मैं रुस्वा तेरी मरज़ी क्यों है
ज़िन्दगी दी है तो ख़ुश रहना है
मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010
इस तर्ह इस जहाँ ने बनाया मकीं हमें
पाँव में गरदिश है रुकना है मुहाल्
सोमवार, 22 फ़रवरी 2010
दर्द गहरा हुआ, क़हक़हे बढ गये
मैं मुसाफ़िर हूं ठहरने के लिए वक़्त कहाँ
रविवार, 21 फ़रवरी 2010
हिन्दी ग़ज़ल/ शैलेश ज़ैदी / मुझे इतिहास का पढना अनावश्यक सा लगता है
शाम से पहले : ज़ैदी जाफ़र रज़ा का ग़ज़ल-सग्रह / डा0 परवेज़ फ़ातिमा
शाम से पहले : ज़ैदी जाफ़र रज़ा का ग़ज़ल-सग्रहशुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010
हिन्दी ग़ज़ल / शैलेश ज़ैदी / प्रशंसाओं से अपनी मुग्ध होकर बोल उठता है
हिन्दी ग़ज़ल /तिमिर के बीच मैं जलते दियों को देखता हूं
गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010
हिन्दी ग़ज़ल / शैलेश ज़ैदी
बुधवार, 17 फ़रवरी 2010
ख़ून के रिश्तों में अब कोई कशिश कैसे मिले
ख़ून के रिश्तों में अब कोई कशिश कैसे मिले।
लोग हैं सर्द बहोत दिल में तपिश कैसे मिले॥
दुश्मनी दौरे-सियासत की दिखावा है फ़क़त,
मस्लेहत पेशे-नज़र हो तो ख़लिश कैसे मिले॥
बर्क़-रफ़्तार शबो-रोज़ हैं, ठहराव कहाँ,
वज़अदारी-ओ-मुहब्बत की रविश कैसे मिले॥
किस ख़ता पर हैं लगाये गये उसपर इल्ज़ाम,
राज़ खुलता नहीं रूदादे-दबिश कैसे मिले ॥
साहबे-रुश्दो-कमालात कहाँ से लायें,
मकतबे-दानिशो-इरफ़ानो-अरिश कैसे मिले॥
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मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010
घी और गुड़ के रोटी के पोपे लज़ीज़ थे
तुम्हारे दिल में हैं लेकिन शरीके-ग़म हैं वहाँ
सोमवार, 15 फ़रवरी 2010
फ़िरऔन मिलते रहते हैं मूसा कहीं नहीं
रविवार, 14 फ़रवरी 2010
लौट कर आयी थी यूं मेरी दुआ की ख़ुश्बू
लौट कर आयी थी यूं मेरी दुआ की ख़ुश्बू ।
दिल को महसूस हुई उसकी सदा की ख़ुश्बू॥
रेग़ज़ारों में नज़र आया जमाले-रुख़े-यार,
कोहसारों में मिली रंगे-हिना की ख़ुश्बू॥
हम ने देखा है सराबों में लबे-आबे-हयात,
माँ की शफ़्क़त में है मरवाओ-सफ़ा की ख़ुश्बू॥
लज़्ज़ते-हुस्न की मुम्किन नहीं कोई भी मिसाल,
लज़्ज़ते-हुस्न में होती है बला की ख़ुश्बू॥
पलकें उठ जयें तो बेसाख़्ता बिजली सी गिरे,
पलकें झुक जायें तो भर जाये हया की ख़ुश्बू॥
हुस्ने-मग़रूर पे छा जाये मुहब्बत का ख़ुमार,
दामने-इश्क़ से यूं फूटे वफ़ा की ख़ुश्बू॥
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रेगज़ारों=मरुस्थलों, जमाले-रुखे-यार=महबूब का रूप-सौन्दर्य,
कोहसारों=पहाड़ों, रंगे-हिना=मेहदी का रग, लज़्ज़ते-हुस्न=सौन्दर्य का आस्वादन, बे-साख्ता=सहज,
हुस्ने-मगरूर=घमंडी सौन्दर्य,
नज़र में हर सम्त बस उसी की है जलवासाज़ी
शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010
सुना है उसके शबो-रोज़ उससे पूछते हैं
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2010
सूरज की शुआएं शायद थीं आसेब-ज़दा
सूरज की शुआएं शायद थीं आसेब-ज़दा ।
डर था के न हम हो जायें कहीं आसेब-ज़दा॥
हम कुछ बरसों से सोच के ये बेचैन से हैं,
आते हैं नज़र क्यों मज़हबो-दीं आसेब-ज़दा ॥
ये वक़्त है कैसा गहनाया गहनाया सा,
फ़िकरें हैं सभी अफ़्सुरदा-जबीं आसेब-ज़दा ॥
तख़ईल के चूने गारे से तामीर किया,
हमने जो मकाँ, हैं उसके मकीं आसेब-ज़दा ॥
महफ़ूज़ नहीं कुछ द्श्ते-बला के घेरे में,
हैराँ हूँ के हैं अफ़लाको-ज़मीं आसेब-ज़दा ॥
नाहक़ हैं परीशाँ-हाल से क्यों जाफ़र साहब,
इस दुनिया में कुछ भी तो नहीं आसेब-ज़दा॥
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