Tuesday, March 9, 2010

गंगाजल की क़समें खा लें।

गंगाजल की क़समें खा लें।
फिर भी चलेंगे दुश्मन चालें।
कुछ तो कभी हो उनकी इनायत,
ऐसी कोई राह निकालें॥
ज़ुल्म से बाज़ न आयेंगे वो,
जितना चाहें रो लें गा लें॥
कुछ कम कर लें उनसे तवक़्क़ो,
कुछ पागल दिल को समझा लें॥
बेचैनी बढ़ती जाती है,
किस हद तक हम ख़ुद को सभालें॥
खलियानों का क़ीमती ज़ेवर,
सोने जैसी धान की बालें।
भीग गये बारिश में कपड़े,
धूप कहां है जिसमें सुखा लें॥
क्या मालूम ये वक़्त की मौजें,
किसको डुबोएं किसको उछालें।
तनहाई में साथ तो देंगी,
बेहतर है कुछ चिड़ियाँ पालें॥
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1 comment:

venus kesari said...

॥कुछ कम कर लें उनसे तवक़्क़ो,
कुछ पागल दिल को समझा लें

क्या मालूम ये वक़्त की मौजें,
किसको डुबोएं किसको उछालें।

तनहाई में साथ तो देंगी,
बेहतर है कुछ चिड़ियाँ पालें॥



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