Wednesday, March 24, 2010

मौत के फूल

रात के तीसरे पहर में कहीं /
किसी वीरान यख़-ज़दा शब में /
बाज़ुओं की हरारतों से भरे/
ठोस लेकिन गुदाज़ झूले में/
बाप लिपटाये अपने बच्चे को /
प्यार से दे रहा है ढारस सी /
कसती जाती है मौत की रस्सी /
ज़र्द चेहरा रुकी-रुकी साँसें /
लफ़्ज़ शीशे की तर्ह टूटे हुए /
आँखें वीरानियों में खोई हुई /
मामता आस्माँ से झाँकती है /
मौत के फूल अपने आँचल में /
आँसुओं की ज़ुबाँ से टाँकती है।
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1 comment:

Sonal Rastogi said...

बाज़ुओं की हरारतों से भरे/ठोस लेकिन गुदाज़ झूले में/बाप लिपटाये अपने बच्चे को /प्यार से दे रहा है ढारस सी
अब क्या कहूं इन पंक्तियों ने तो मन छू लिया