Tuesday, March 9, 2010

इस तर्ह मेरे साथ हैं घर के दरो-दीवार्

इस तर्ह मेरे साथ हैं घर के दरो-दीवार्॥
सहरा में नज़र आते हैं उगते दरो-दीवार्॥

खुल जाते हैं इदराक के नादीदा दरीचे,
बन जाते हैं एहसास के लम्हे दरो-दीवार॥

मैं क़ब्र में भी रहने नहीं पाया सुकूँ से,
करते रहे तामीर फ़रिश्ते दरो-दीवार॥

क्यों लोग निसाबों से निकलते नहीं बाहर,
क्यों लगते हैं तालीम के साँचे दरो-दीवार्॥

ग़ालिब की तरह हम भी बना लेंगे कोई घर,
दुनिया से बहोत दूर कहीं बे-दरो-दीवार॥

बेमेहरिए-अफ़लाक का हम शिक्वा करें क्या,
वरसे में मिले हैं ये सुलगते दरो-दीवार॥
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इदराक=बौद्धिकता । नादीदा-दरीचे=अनदेखी खिड़कियाँ । निसाब=पाठय्क्रम ।बेमेहरिए-अफ़लाक=आसमानों के अत्याचार्।वरसे में=उत्तराधिकार में।

1 comment:

निर्मला कपिला said...

क्यों लोग निसाबों से निकलते नहीं बाहर,
क्यों लगते हैं तालीम के साँचे दरो-दीवार्
और बेमेहरिये अफलाक --- सब से अधिक पसंद आये मगर पूरी गज़ल लाजवाब है धन्यवाद