Wednesday, March 17, 2010

सो नहीं पाया कई रातों से

सो नहीं पाया कई रातों से ।
लोग नालाँ हैं मेरी बातों से॥
ज़िन्दगी! तुझको समझ सकते हैं,
हम अचानक हुई बरसातों से॥
दिल से मिट जाते हैं सब अन्देशे,
रब्त बढता है मुलाक़ातों से॥
कुरसियाँ हो चुकीं आदी इसकी,
कुछ भी हासिल नहीं सौग़ातों से॥
ये बताने में झिजकते क्यों हैं,
रिशते हैं आज भी देहातों से॥
क्यों है महँगाई ज़रा पूछते हैं,
किसी बनिए के बही खातों से॥
हम ग़रीबों से दलित हैं बेहतर ,
क्या मिला हमको बड़ी ज़ातों से॥
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