Wednesday, March 3, 2010

बहोत भीनी हो जो ख़ुश्बू किसे अच्छी नहीं लगती।

बहोत भीनी हो जो ख़ुश्बू किसे अच्छी नहीं लगती।
हमारे देश में उर्दू किसे अच्छी नहीं लगती॥

हवाएं धीमे-धीमे चल रही हों हलकी ख़ुनकी हो,
फ़िज़ा ऐसी बता दे तू किसे अच्छी नहीं लगती।

वो महफ़िल जिसमें तेरा ज़िक्र हो हर एक के लब पर,
तजल्ली हो तेरी हर सू किसे अच्छी नहीं लगती॥

ग़ज़ालाँ-चश्म होने का शरफ़ मुश्किल से मिलता है,
निगाहे-वहशते-आहू किसे अच्छी नहीं लगती॥

मुहब्बत तोड़कर रस्मे-जहाँ की सारी दीवारें,
अगर हो जाये बे-क़ाबू किसे अच्छी नहीं लगती॥
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2 comments:

निर्मला कपिला said...

सब से पहले मतला तो जैसे सब के दिल की आवाज़ है।
वो महफ़िल जिसमें तेरा ज़िक्र हो हर एक के लब पर,
तजल्ली हो तेरी हर सू किसे अच्छी नहीं लगती॥
आपकी गज़लों को पढने के लिये उर्दू डिकशनरी जरूर देखनी पडती है। सभी शेर बहुत च्छे लगे शायद ये बताने की बात नही है। धन्यवाद।

RaniVishal said...

Waakai Urdu jaisi mithe zubaan kise acchi nahi lagati ...hamesha ki tarah yah gazal bhi lajawab hai ! Nirmala ji ki baat se sahmat hun aapse ek vinamr nivevan hai main aapki rachanao ko bahut shiddat se padati hun isliye ye gujarish kar rahi hun ki aap kuch khas shabdo ke shbdarth bhi diya kijiye...taki aur bhi sikhane ko mile!
Sadar