Sunday, February 14, 2010

लौट कर आयी थी यूं मेरी दुआ की ख़ुश्बू

लौट कर आयी थी यूं मेरी दुआ की ख़ुश्बू ।

दिल को महसूस हुई उसकी सदा की ख़ुश्बू॥

रेग़ज़ारों में नज़र आया जमाले-रुख़े-यार,

कोहसारों में मिली रंगे-हिना की ख़ुश्बू॥

हम ने देखा है सराबों में लबे-आबे-हयात,

माँ की शफ़्क़त में है मरवाओ-सफ़ा की ख़ुश्बू॥

लज़्ज़ते-हुस्न की मुम्किन नहीं कोई भी मिसाल,

लज़्ज़ते-हुस्न में होती है बला की ख़ुश्बू॥

पलकें उठ जयें तो बेसाख़्ता बिजली सी गिरे,

पलकें झुक जायें तो भर जाये हया की ख़ुश्बू॥

हुस्ने-मग़रूर पे छा जाये मुहब्बत का ख़ुमार,

दामने-इश्क़ से यूं फूटे वफ़ा की ख़ुश्बू॥

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रेगज़ारों=मरुस्थलों, जमाले-रुखे-यार=महबूब का रूप-सौन्दर्य,

कोहसारों=पहाड़ों, रंगे-हिना=मेहदी का रग, लज़्ज़ते-हुस्न=सौन्दर्य का आस्वादन, बे-साख्ता=सहज,

हुस्ने-मगरूर=घमंडी सौन्दर्य,

2 comments:

Suman said...

nice

निर्मला कपिला said...

हुस्ने-मग़रूर पे छा जाये मुहब्बत का ख़ुमार,

दामने-इश्क़ से यूं फूटे वफ़ा की ख़ुश्बू॥
वाह वाह बहुत खूब शुभकामनायें