Sunday, February 7, 2010

हिस्सियाती आबशारों का नुमायाँ माहसल

हिस्सियाती आबशारों का नुमायाँ माहसल ।
मुख्तसर नज़मों का मजमूआ है ऐवाने-ग़ज़ल्॥

तेज़ रफ़तारी पे नाज़ाँ हैं शुआएं मेह्र की,
पर ग़ुबार-आलूद मौसम है सलीबे-जाँ गुसल्॥

वक़्त हिकमत-साज़ है नब्ज़ों पे रखता है निगाह,
ये बदल लेता है पहलू देख कर मौक़ा महल ॥

संग-पैकर बुत की आँखों से रवाँ है सैले-आब,
दामने-कुहसार पर हैं दाग़हाए-ला यज़ल्॥

ये ज़मीं, अशजार,हैवानो-बशर मैं ही तो हुं,
मैं ही अव्वल, मैं ही आखिर, मैं अबद, मैं ही अज़ल॥
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1 comment:

Suman said...

ये ज़मीं, अशजार,हैवानो-बशर मैं ही तो हुं, मैं ही अव्वल, मैं ही आखिर, मैं अबद, मैं ही अज़ल॥*************nice