Thursday, February 25, 2010

नारीजन्य-अनुभूति की उर्दू कवयित्री शाइस्ता जमाल / शैलेश ज़ैदी

नारीजन्य-अनुभूति की उर्दू कवयित्री शाइस्ता जमाल
शाइस्ता जमाल में शाइस्तगी यानी एक संतुलित गांभीर्य भी है और जमाल यानी सौन्दर्य भी।रूप का आकर्षण ऐसा कि उन्हें देख कर ग़ज़ल सार्थक हो उठती है।ग़ज़ल का शाब्दिक अर्थ भले ही महबूब से बातें करना हो।लेकिन महबूब जब स्वयं मुहिब बन जाये और अपने दर्द को शब्द देने लगे तो ग़ज़ल दोआतशा [काक्टेल] के आस्वादन से भर जाती है। शाइस्ता की ग़ज़लें ऐसी ही हैं। बशीर बद्र ने जब उनकी ग़ज़लोँ के हरम में झाँका तो अपना एक शेर ही उन्हें समर्पित कर बैठे।आप भी इस शेर का मज़ा लीजिए और इस में मानी की गहराइयाँ तलाश कीजिए-
चमकती है कहीं सदियों में आँसुओं से ज़मीं,
ग़ज़ल के शेर कहाँ रोज़-रोज़ होते हैं।
ख़ुमारे-ग़ज़ल[2007] शाइस्ता की ग़ज़लों का संग्रह है।शाइस्ता की ख़ूबी ये है के गहरी से गहरी बात बड़े सहज ढग से कह जाती हैं।अधिकतर तो ऐसा ही लगता है जैसे वो शेर कहने के बजाय ख़ुद से बातें कर रही हों।इस से पहले के मैं कुछ और कहूं आप भि उनके कुछ शेर देखिए-
ज़िन्दगी तेरी हदों में क्यों रहूं,
वक़्त की इन बन्दिशों में क्यों रहूं।
किन यादों में खो जाती हूं,
बैठे-बैठे सो जाती हूं।
सुकूं मुझको मयस्सर आ गया है नीली आँखों में,
जब उनको देख लेती हूं समन्दर याद आता है।
इक रोशनी सी फैल गयी जिस्म में तमाम,
आकर तेरे ख़याल ने क्या-क्या मज़ा दिया।
मेरी निगाह में जीने के ख़्वाब कब से हैं,
ये सारे ख़्वाब तेरे प्यार के सबब से हैं।
ज़माने भर के ग़मों से निजात मिल जाये,
क़रीब आओ के मुझको हयात मिल जाये।
शाइस्ता के अश'आर में बेबाकी है, किन्तु मर्यादाओं की सीमा पार करना उन्हें पसन्द नहीं।आग के दरिया की कई-कई तहें हैं जो मौजें मार रही हैं, लेकिन ये आग किसी दूरी का अह्सास नहीं देती।दर्द के वीरान गोशे हैं लेकिन निराशाओं के विकसित होने की कोई गुंजाइश नहीं।आस-पास के यथार्थ को भी एक पैनी नज़र से देखना उनका स्वभाव है और यही उनकी सहजता भी है।इस सिल्सिले के चन्द शेर देखिए-
सब कुछ फ़क़ीहे-शह्र ने मस्जिद में पा लिया,
अन्धा फ़क़ीर भूक की शिद्दत से मर गया।
वो जो थक के बैठा है लौट कर सराबों से,
उससे पूछ कर देखूँ तशनगी के बारे में।
रोज़ अख़बार में पढती हूं जली है दुलहन,
एक ये ज़ुल्म ही काफ़ी है बग़ावत के लिए।
जीना भी मेरा शह्र में दुश्वार रहेगा,
जबतक के यहाँ ज़ुल्म का बाज़ार रहेगा।
पहले शेर में इस्लामी धर्म-सहिता के आचार्य[फ़क़ीह] पर तीखा व्यंग्य किया गया है।वो मस्जिद में अपनी लोकप्रियता प्राप्त करके ख़ुश है और यह नहीं देखना चाहता के मस्जिद के ठीक बाहर एक फ़क़ीर जो अंधा है यानी कुछ भी जुटा पाने के योग्य नहीं है, भूक से दम तोड़ गया।उसका इस्लामी क़ानून जन-सपर्क से कितना कट गया है। दूसरे शेर में हर दरवाज़े से उम्मीदों का टूट जाना और अन्त में थक हार कर अभावों की दुनिया में लौट आने का सकेत है। दुल्हन के जलाए जाने की बात सभी करते हैं,लेकिन इन्क़लाब के लिए इसे एक ठोस आधार बना लेना शाइस्ता की सोच का मज़बूत पहलू है।इस परिचयात्मक लेख को अनावश्यक रूप से तवील करने के बजाय शाइस्ता की ग़ज़लों से कुछ शे र दर्ज कर रहा हूं-
तुम तो सूरज हो कहीं दिन में भटक जाओगे,
मुझको जीने के लिए रात के तारे दे दो॥
हसरतें अपनी जँ गँवा बैठीं,
आरज़ू मुद्दतों से प्यासी है॥
कौन कहता है उसे शह्र में आ जाने दो,
इक जगह रहते नहीं हैं कभी दीवाने दो॥
ज़िन्दगी तेरे लिए दर्द के सारे चेहरे,
अपने नग़मों के तबस्सुम में छुपाये हमने॥
ख़ुद को तामीर किया जोड़ के लमहा-लमहा,
नक़्श तहज़ीब के सदियों में बनाये हमने॥
अंधेरे नापना मुश्किल नहीं है,
मगर सूरज का इतना दिल नहीं है॥
काश वो मुझको दिखाये कभी ऐसा बनकर,
हर क़दम साथ रहे मेरी तमन्ना बनकर्॥
फ़ासला इतना ज़ियादा न रहे चाहत में,
टूट जाये न किसी रोज़ ये रिश्ता बनकर्॥
ज़िन्दगी पर मेरा यक़ीन तो हो,
साँप भी पालूं आस्तीन तो हो॥
तनहाई मेरे साथ गयी मैं जहाँ गयी,
मुझको मेरे वुजूद ने अच्छा सिला दिया॥
शाइस्ता उसके ग़म में जली हूं मैं बारहा,
लेकिन जब उसने छू लिया, सब आबले गये॥
अन्त में शाइस्ता के ही एक शेर पर अपनी बात ख़त्म करता हूं।उनकी शायरी का परिचय इस शेर से किसी हद तक हासिल किया जा सकता है-
फैल जाती हूं जहाँ तक भी नज़र जाती है,
मैं तो दरिया हूं कनारों पे कहाँ बहती हूँ॥
1978 में भोपाल में जन्मी शाइस्ता जमाल मुशाइरों की एक मशहूर शायरा हैं। बी0काम0 करने के बाद कम्प्यूटर साफ़्टवेयर में विशेष दक्षता प्राप्त कर चुकी हैं।
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2 comments:

Suman said...

मैं तो दरिया हूं कनारों पे कहाँ बहती हू.nice

तिलक राज कपूर said...

तसव्‍वुर ने मंज़र जिया ही नहीं तो

मुकम्‍मल कोई शेर होता नहीं है।
शाइस्‍ता जी की शायरी तसव्‍वुर में जिये गये मंज़र हैं।