Monday, February 15, 2010

फ़िरऔन मिलते रहते हैं मूसा कहीं नहीं

फ़िरऔन मिलते रहते हैं मूसा कहीं नहीं ।
इज़हारे-हक़ की आज तमन्ना कहीं नहीं॥

छोटी बड़ी हैं कितनी महाभारतें यहाँ,
तीरों से छलनी भीष्म पितामा कहीं नहीं॥

दुर्योधनों के क़ब्ज़े में है द्रोपदी का हुस्न,
मुश्किल-कुशाई के लिए कान्हा कहीं नहीं॥


लैलाएं महमिलों में हैं तस्वीरे-इज़्तेराब,
खोया है जिसमें क़ैस वो सहरा कही नही॥

मिट जाये उसके और मेरे दर्मियाँ का फ़र्क़,
मेरी हयात में ये करिश्मा कहीं नहीं ॥
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फ़िरऔन=मिस्र का अहंकारी सम्राट जिस् ने ख़ुदाई का दावा किया।मूसा= मुसलमानों और ईसाइयों के नबी और यहूदियों के पथ-प्रदर्शक जिन्होंने फ़िरऔन का सर्वनाश किया।,इज़हारे-हक़=सत्य की अभिव्यक्ति । मुश्किलकुशाई=सकट दूर करना । महमिलों=ऊँट पर बाँधने की वह डोली जिसमें स्त्रियाँ बैठती हैं। क़ैस=मजनूं । सहरा=जगल ।

2 comments:

RaniVishal said...

दुर्योधनों के क़ब्ज़े में है द्रोपदी का हुस्न,
मुश्किल-कुशाई के लिए कान्हा कहीं नहीं॥
बहुत ही सटीक व सामयीक रचना है ....आभार!!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

Yusuf Kirmani said...

बहुत शानदार है। आपने जिस तरफ इशारा किया है वह काबिलगौर है।