Friday, February 12, 2010

सुना है उसके शबो-रोज़ उससे पूछते हैं

सुना है उसके शबो-रोज़ उससे पूछते हैं।
जहाँ में उसके हैं क्या क्या करिश्मे पूछते हैं॥

सुना है उसको ग़ुरूर अपने हुस्न पर है बहोत,
हमी नहीं, उसे दिन रात कितने पूछते हैं॥

सुना है उसके ही जलवे हैं सारे आलम में,
रुमूज़े-इश्क़ है क्या ज़र्रे-ज़र्रे पूछते हैं॥

सुना है रातों को भी नीन्द उसे नहीं आती,
जभी तो उसको हमेशा उजाले पूछते हैं॥

सुना है सारे गुनाहों को बख़्श देता है,
करीम है वो जभी उसको बन्दे पूछते हैं॥
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4 comments:

वेदिका said...

बहुत खूब है गजल

शुभ-कामनाएं

सागर said...

बहुत खूब ...!!!!

vedansh said...

वाह-वाह बहुत खूब,आपकी ये नज़्में दिल को बड़ा सुकून देती हैं और आने वाली नस्ल के लिए आपकी भाषा भी सीखने का बहुत अच्छा माध्यम बन सकती है....
मैं भी अभी उम्र के उसी दौर में हूँ जब नज़्में और ग़ज़लें काफी अच्छी लगती हैं ...सर मैंने भी अभी अभी एक ब्लॉग शुरू किया है ..पूरा भरोसा है आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा....

वेदांश said...

वाह-वाह बहुत खूब,आपकी ये नज़्में दिल को बड़ा सुकून देती हैं और आने वाली नस्ल के लिए आपकी भाषा भी सीखने का बहुत अच्छा माध्यम बन सकती है....
मैं भी अभी उम्र के उसी दौर में हूँ जब नज़्में और ग़ज़लें काफी अच्छी लगती हैं ...सर मैंने भी अभी अभी एक ब्लॉग शुरू किया है ..पूरा भरोसा है आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा....