Thursday, February 18, 2010

हिन्दी ग़ज़ल / शैलेश ज़ैदी

मैं कि था निःशब्द फिर भी कोई मुझमें था मुखर।
मेरे अन्तस में थी मेरी अपनी ही पीड़ा मुखर ॥
कल्पना मेरी बना लेती है आकृतियाँ कई,
रंग मैं जो भी भरूं रहता है वो मुखड़ा मुखर्॥
बस्तियाँ गोकुल की पल भर में बसा लेता हूं मैं,
कृष्ण , राधा, गोपियाँ हो जाते हैं सहसा मुखर्॥
मन में कोई भी महाभरत उभर आती है जब,
चेतना के मंच पर पाता हूं मैं गीता मुखर ॥
व्यावहारिक रूप संकल्पों को जब देता हूं मैं,
हो नहीं पाती मेरे मन में कोई दुविधा मुखर्॥
होती है नैराश्य में नीरव निशा की कालिमा,
रश्मियाँ सूरज की लेकर र्है सदा आशा मुखर्॥
घर की दीवारें सिमट कर घेर लेती हैं मुझे,
देखती हैं जब कि मुझ में है कोई विपदा मुखर्॥
कैसे कह दूं भीड़ में स्तब्ध सा रहता हूं मैं,
कैसे बतलाऊं कि है एकान्त में क्या क्या मुखर्॥
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2 comments:

Suman said...

बस्तियाँ गोकुल की पल भर में बसा लेता हूं मैं,
कृष्ण , राधा, गोपियाँ हो जाते हैं सहसा मुखर्॥
nice

निर्मला कपिला said...

बहुत खूब देख लीजिये आज नाईस जी ने शायद पहली बार इस पोस्ट पर नाईस से अधिक कुछ लिखा है आप खुद ही समझ सकते हैं कि रचना कितनी अद्भुत होगी। धन्यवाद