Friday, February 27, 2009

ऐ मौत के फ़रिश्ते ! झिजकता है किस लिए.

ऐ मौत के फ़रिश्ते ! झिजकता है किस लिए.
लेजा हयात, गोशे में सिमटा है किस लिए.
इस ज़िन्दगी के हम कभी मालिक नहीं बने,
फिर ज़िन्दगी की हमको तमन्ना है किस लिए.
ये रिश्ते-नाते जितने भी हैं, सब हैं आरज़ी,
इंसान इनसे प्यार से लिपटा है किस लिए.
वैसे ही जल रहा हूँ, जलाती है और क्यों,
दुनिया! ये तेरी हरकते-बेजा है किस लिए.
बाज़ार में सजी हुई हर जिन्स की तरह,
हम भी थे, हमको तू ने खरीदा है किस लिए.
तेरे बताये रास्ते पर चल रहा था मैं,
मंज़िल जब आ गयी, मुझे रोका है किस लिए.
मौतो-हयात दोनों की है मांग हर तरफ़,
ख्वाहिश है जिसकी जो, नहीं मिलता है, किस लिए।


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1 comment:

गौतम राजरिशी said...

अच्छी है सर....मतला बहुत सशक्त और ये शेर बहुत भाया "तेरे बताये रास्ते पर चल रहा था मैं/मंज़िल जब आ गयी, मुझे रोका है किस लिए"