Wednesday, February 4, 2009

गुनगुनाते हुए सब तुमको नज़र आयेंगे.

गुनगुनाते हुए सब तुमको नज़र आयेंगे.
इन दरख्तों पे भी कल बर्गो-समर आयेंगे.
चाँदनी, जाम में भर देगी, गुलों की नकहत,
रिंद, पीने के लिए, छत पे उतर आयेंगे.
मछलियाँ निकलेंगी ले-ले के समंदर से गुहर,
जौहरी साहिलों पर मिस्ले-शजर आयेंगे.
एक सैयारा करेगा मेरे आँगन का तवाफ,
सब नुजूमी मेरे दालान में भर आयेंगे.
आबशारों में हक़ायक़ के, नहायेंगे अदीब,
रूप फनकारों के कुछ और निखर आयेंगे.
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1 comment:

परमजीत बाली said...

बहुत अच्छी गज़ल है।