Tuesday, December 9, 2008

दीप से दीप जलने की संभावना अब नहीं रह गई.

दीप से दीप जलने की संभावना अब नहीं रह गई.
चित्त में प्रज्ज्वलित थी जो संवेदना अब नहीं रह गई.
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आरती के सभी शब्द अधरों पे ही नृत्य करते रहे,
चीर कर मन निकलती थी जो प्रार्थना, अब नहीं रह गई.
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अब नहीं होतीं तेजस्वियों की सभाएं किसी मोड़ पर,
जिसमें चिंतन-मनन हो वो उदभावना अब नहीं रह गई.
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बाप बेटे, बहेन भाई माँ और बाबा सभी बँट गए,
एक जुट स्वस्थ परिवार की कल्पना अब नहीं रह गई,
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सबकी काया में आतंकवादी शरण ले रहे हैं कहीं,
एक की दूसरे के लिए सांत्वना अब नहीं रह गई.
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जिसको जो चाहिए बेझिझक आपसे छीन लेता है वो,
कोई बिनती-सुफारिश, कोई याचना अब नहीं रह गई.
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लक्ष्य पर दृष्टि पहले की सूरत ही सबकी है अब भी मगर,
लक्ष्य की प्राप्ति में अनवरत साधना अब नहीं रह गई.
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2 comments:

गिरीश बिल्लोरे "मुकुल" said...

सौ फीसदी सहमत हूँ जी

Dr. Amar Jyoti said...

'लक्ष्य पर…' आज का कड़वा सच!
बधाई।