Friday, December 19, 2008

अंधेरे रोशनी की पगडियां बांधे हुए निकले.

अंधेरे रोशनी की पगडियां बांधे हुए निकले.
मगर इस रूप में भी सबके पहचाने हुए निकले.
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बज़ाहिर उनके चेहरों पर भी थी मुस्कान की रेखा,
निकट आये तो सब दुःख-दर्द के पाले हुए निकले.
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अनोखी है नशे की दृष्टि से संसद की मधुशाला
यहाँ सब लड़खड़ाते, झूमते, गिरते हुए निकले.
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चुनौती दे रहा था जब समय वो मौन थे घर में,
टला संकट तो फिर अंगडाइयां लेते हुए निकले.
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मुझे सहयोग की आशाएं थीं, पर जब मिला उनसे,
मेरी ही तर्ह वो हालात के मारे हुए निकले.
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न जाने उसकी महफ़िल में हुआ क्या, ऐसी क्या बीती,
वहाँ से जितने निकले अपना दिल थामे हुए निकले.
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पले थे शान्ति के उजले कबूतर यूँ तो हर घर में,
वो उड़ते किस तरह जब उनके पर काटे हुए निकले.
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वहाँ फुर्सत थी किसको जो हमारी बात सुन लेता,
वहाँ अपनी समस्याओं में सब उलझे हुए निकले.
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सुरक्षा का कवच होता तो हम भी शेर बन जाते,
पड़ी थी जान पर, करते भी क्या, भागे हुए निकले.
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हमारी कथनी-करनी एक हो तो कौन पूछेगा,
हम अपने राजनेताओं से यह सीखे हुए निकले.
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2 comments:

विनय said...

बहुत बढ़िया जी!

इस्मत ज़ैदी said...

पले थे शान्ति के उजले कबूतर यूँ तो हर घर में,
वो उड़ते किस तरह जब उनके पर काटे हुए निकले.

ज़बर्दस्त !
बहुत उम्दा!
बिल्कुल आज इसी कबूतर के उड़ने की या यूं कहें कि उड़ाए जाने की अशद ज़रूरत है