Monday, December 8, 2008

ज़मीन गुम थी कहीं, आसमान गायब था.

ज़मीन गुम थी कहीं, आसमान गायब था.
वुजूद होके मेरा बेनिशान, गायब था.
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हमें अज़ीज़ थीं फिरका-परस्तियाँ इतनी,
हमारे नक्शे से हिन्दोस्तान गायब था.
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सुबह मैं निकला था तो घर भी था मकान भी था,
जो लौटा शाम को घर था मकान गायब था.
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कहा था उसने कि नफ़रत को यूँ फ़रोग न दो,
ख़बर छपी तो ये सारा बयान गायब था.
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कबूतरों का था जमघट अभी यहाँ कल तक,
चलीं जो गोलोयाँ, भरकर उड़ान, गायब था.
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बनाया था जिसे उसने बहोत मुहब्बत से,
खुली जो आँख तो उसका जहान गायब था.
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चला था लेके मैं उस कारवान को हमराह,
अकेला रह गया मैं, कारवान गायब था.
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हम एक होके शगुफ़्ता-मिज़ाज लगते थे,
हमारे चेहरों से वहमो-गुमान गायब था.
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2 comments:

Manoshi said...

good!

Dr. Amar Jyoti said...

'हमें अज़ीज़ थीं…'
'कहा था उसने…'
बहुत ख़ूब! बहुत ही ख़ुब!