Tuesday, December 30, 2008

क़ौल का जिस शख्स के मुत्लक़ भरोसा ही न हो.

क़ौल का जिस शख्स के मुत्लक़ भरोसा ही न हो.
है यही बेहतर कि उस से कोई रिश्ता ही न हो.
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किस क़दर जाँसोज़ो-हैरत-खेज़ था वो हादसा,
उसने इस पहलू से मुमकिन है कि सोचा ही न हो.
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वो हक़ाइक़ को नज़र-अंदाज़ करता आया है,
मुझको शक है साजिशों में हाथ उसका ही न हो.
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हमने सारा जाल ख़ुद से बुन लिया, कहता है वो,
क्या करे, जब बात उसकी कोई सुनता ही न हो.
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कर चुका है अपनी गैरत का वो सौदा बारहा,
मुझको अंदेशा है आइन्दा भी ऐसा ही न हो.
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कुछ कहीं एहसास उसको ज़ुल्म का होगा ज़रूर,
वरना क्यों वो चाहता है इसका चर्चा ही न हो.
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धूप थोड़ी सी जो मिल जाती तो कट जाता ये दिन,
आज मुमकिन है कि सूरज घर से निकला ही न हो.
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ये भी हो सकता है मेरी ही ग़लत हो याद-दाश्त,
उसके मेरे दरमियाँ मिलने का वादा ही न हो.
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कौल = वचन. मुत्लक़ = तनिक भी. जाँसोज़ = प्राणों को जलाने वाला. हैरत-खेज़ =आश्चर्यजनक. हक़ाइक़ = वास्तविकता. नज़र-अंदाज़ = तिरस्कृत. साज़िश = षड़यंत्र. गैरत = स्वाभिमान.

5 comments:

Amit said...

बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है...

Dr. Amar Jyoti said...

'धूप थोड़ी सी जो…'
'ये भी हो सकता है…'
मार्मिक!

विनय said...

नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाएँ!

विनय said...

नववर्ष की हार्दिक मंगलकामनाएँ!

गौतम राजरिशी said...

सुंदर गज़ल जैदी साब "कुछ कहीं एहसास उसको ज़ुल्म का होगा ज़रूर,/ वरना क्यों वो चाहता है इसका चर्चा ही न हो"...क्या बात है जनाब...हम तो पढ़ते हैं और नत-मस्तक हो जाते हैं
नये साल की ढ़ेरों शुभकामनायें