Friday, December 5, 2008

अब किसे बनवास दोगे [ राम काव्य / पुष्प : 2 ]

पुष्प 2 : खाईं बहुत गहरी है

[एक]

बातें सभी करते हैं मायावी,
रहते हैं व्यस्त सब जुटाने में हथियार,
चाहते हैं होना एक-दूसरे पर हावी.
अर्थहीन शब्दों का
करते हैं आये दिन व्यापार.
विकसित, विकासशील और अल्पविकसित,
स्थिति सभी देशों की
लगभग है एक सी.

रेंगती है आसुरी मनोवृत्ति
सैकड़ों फनों के साथ.
चौड़े विशाल वक्षों के भीतर से
झाँकती हैं, चारों दिशाओं में
दैत्याकार शक्लें.
लम्बी जबानें,
लाल-लाल आँखें,
भूखी, अतृप्त-आत्माएँ.
जनवादी चेहरों से आती है
सुलगते बारुद की महक.
शक्ति-सम्पन्न देश
लम्बी नुकीली उंगलियों पर चलाते हैं
लहू की रेलगाड़ी -
छक-छक-छकाछक!
कांटे ही काँटे हैं,
सूझता नहीं है पथ.
छाया है चारों दिशाओं में अन्धकार.

व्याकुल, निराश, संत्रास-ग्रस्त पृथ्वी,
याचना की मूर्त्ति सी बनी,
सिर धुनती है,
चीखती चिल्लाती है,
काँप-काँप जाती है .
वैज्ञानिक विकास के रेतीले शिखरों पर
खड़े हुए देशों का संवेदन-शून्य मन,
खो चुका है आस्वादन
जीवन का,
उड़ता है आदमी हवा में
जैसे एक तिनका.
धरती और धरती के बीच
खाईं बहुत गहरी है.

[दो]
मैं करता हूँ महसूस
कि शायद मुझमें नहीं है
खाईं पाटने की ताकत.
जुटाना चाहता हूँ मैं अपनी मुटिठ्यों में,
आदमी का हक बाँटने की ताकत.
और जब देखता हूँ अपनी ढीली मुटिठ्यों को,
हथेली की रेखाएँ
रेंग जाती हैं मेरे भीतर.
तराशती हैं याददाश्तों के पत्थर.
उभारती हैं ताकतवर छवियाँ.
मुझे लगता है कि इन छवियों से मिलकर,
हो जाता है आसान,
आदमी को उसका हक बाँटना.
मुझे आता है याद
कि स्थितियाँ उस समय भी
लगभग ऐसी ही थीं,
फैला था इसी तरह आतंक पृथ्वी पर
चारों ओर,
आसुरी शक्तियों से प्रकम्पित थी धरती
इसी तरह.


मायावी घटाएँ,
भूमण्डल को घेरकर
कर रही थीं तारीक.
सुर और असुर शब्दों के बीच
पिस रही थी मानव की संस्कृति
इसी तरह
बारीक!
रेंगती थीं सैकड़ों फनों के साथ
लुंज-पुंज ! विशाक्त ! अपाहिज मान्यताएं.
वैसे तो सुर और असुर होना,
हो सकता है ईश्वरीय वरदान और
अभिशाप का नतीजा.
पर मनुष्य होना है ईश्वर की इच्छा
और ईश्वर की इच्छा
उसके वरदान और अभिशाप से
कहीं अधिक ताकतवर है.
क्योंकि वरदान है उसकी इच्छा के समक्ष
सिर झुकाने का पुरस्कार,
और अभिशाप इसी इच्छा की
अस्वीकृति पर
लगी हुई ठोकर ।
इसलिए वह जो सही अर्थों में मनुष्य है,
पूर्ण मानव है,
ईश्वरीय संस्कृति का उद्गम है,
मर्यादा पुरुषोत्तम है,
मानव का ही नहीं,
स्वयं ईश्वर का प्रियतम है,
उसकी यह पूर्णता ही
ईश्वरीय लीला है.
और यह लीला आदमी को देती है आज़ादी
आदमी की तरह जीने की.
पृथ्वी को करती है सुसंस्कृत.
मैं इसी लीला में देखता हूँ
सौन्दर्यशील ईश्वर के,
अनश्वर, असीम सौन्दर्य की छटा.
मैं इसी में करता हूँ महसूस
आदमी से आदमी के प्यार की घटा.

[तीन]
बांचती हैं यादें एक इतिहास।
सरयू के जल में नहायी अयोध्या की धरती,
होती है जीवन्त आंखों के समक्ष.
गूँजती हैं कानों में सौम्य किल्कारियाँ,
ध्वनियाँ बधावों की,
वेदों के मन्त्रों की,
ग्राम-ग्राम, नगर-नगर.
गूँजते हैं गीतों के मोहक स्वर,
आठ पहर.
आरती उतारती हैं वधुएं रघुनायक की.
हरा भरा दीखती है सारा भूमण्डल.
काँपने लगे हैं खल.
खेतों खलिहानों से उड़ती हैं जीवन की लहरें,
बाँचती हैं यादें एक इतिहास.
देखता हूँ मैं कि एक संवेदनशील मन,
आँखों में झूमता है जिसकी,
स्वस्थ जिन्दगियों का सावन.
बाँटता है राज्य-कोष से अपार धन राशि
जनता में,
वर्ण और जाति के भेदों से उठकर बहुत ऊपर,
भरता है प्रजा में आत्म-विश्वास
और फैला देता है अपने चेहरे का तेज
आम इनसानों के चेहरे पर.

[चार]

चुनता है प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए
कोई न कोई एक व्यवसाय.
मैंने भी चुनी है एक शिक्षक की नियति.
मेरी यह नियति, मुझे गुजारती है,
अध्ययन-अध्यापन के मार्ग से
नित्य प्रति.
कभी कभी लगता है मुझको, कि मेरा ज्ञान
बन्द है उपाधियों के भीतर,
मथकर समुद्र कोई मुक्ता निकालने में
आज तक हूँ असमर्थ.
सागर के तट पर पड़े सीपों को
चुन-चुन कर,
मग्न हो जाता हूँ.
सीपों के भस्म से, मोती बनाता हूँ,
और उस मोती के आबदार होने की चर्चा
करता हूँ जोरदार शब्दों में.

किन्तु वह शिक्षाविद!
महर्षि विश्वामित्र,
सीप नहीं चुनता था,
मोती निकालता था सागर से,
जानता था मोतियों की पहचान.
सीमित नहीं था ज्ञान उसका मेरी तरह.
शब्दों से खेलता नहीं था वह,
तैरती थी शब्द-शब्द जीवन की सच्चाई
आखों में उसके.
आसुरी शक्तियों से आतंकित धरती को,
चाहता था देना आजादी.
विषाक्त जिन्दगियों में चाहता था भरना,
विश्वास का अमृत.
मिथिला प्रदेश ही नहीं, सम्पूर्ण देश
रखता था आशाएं उससे.
दाश्रथीय सागर के बहुमूल्य मोतियों
को चुनकर, वह
चाहता था, खाई में पड़ी मातृभूमि
को ऊपर उठाना,
राम और लक्ष्मण को पाकर वह
भरने लगा रंग, अपनी चाहों में.
गूँजीं वन खण्डों में
जगीन और काकनासुर की चींखें.
सुबाहु की हिचकियाँ.
असुरों का अस्तित्व हो गया धुआँ.
दूषित हवाओं में घुल गयी पूष्पों की महक.

पर में जब देखता हूँ आज !
महानगरों की दैत्याकार ऊँचाई,
खुले हुए जबड़ों का फैलाव,
फैलाव में ठुंसता जन समूह.
लगता है मुझे कि वन खण्डों से निकल कर
असुरों ने
ली है पनाह महानगरों में,
और धंस गये हैं
लम्बी-चौड़ी चहारदीवारियें से घिरी
इमारतों के भीतर.
मुझे लगता है कि वे जब खींचते हैं साँस,
तो हवा के साथ चली जाती है
पेट के गोदाम में,
ढेर सारी जनता.
और जब वे साँस छोड़ते हैं,
तो लग जाता है उसी जनता की हड्डियों का ढेर.
फिर एक बात ये भी है,
कि मुश्किल है इन असुरों की पहचान.
क्योंकि नहीं है आज हमारे बीच, कोई विश्वामित्र!
जो रखता हो राम और लक्ष्मण की परख,
और सिखा सकता हो उन्हें
बला और अतिबला मन्त्र !

[पांच]

यह ठीक है कि मैं नहीं हूं महर्षि विश्वामित्र,
शिक्षाविद होने का दावा भी नहीं है मुझे,
फिर भी मनोबल एक भरता है मुझ में
भारतीय संस्कृति का धवल पुंज,
राम का चरित्र !
मैं इस चरित्र को देखता हूँ-
दशरथ के आँगन में,
सरयू की धड़कन में,
ऋषियों के आश्रम में,
गंगा के सरगम में,
कुंज और कानन में,
जानकी के मन में,
जग-जग के जीवन में.

राम को परम ब्रह्म मानकर,
चाहता नहीं मैं बिठाना देवालय में.
राम ! मर्यादा पुरुषोत्तम, पूर्ण मानव हैं मेरे लिए,
राम को उतारा है मैंने संस्कारों में.
मुग्ध नहीं होता कभी
वाह्य सौन्दर्य पर मैं.
मोहती है मुझको सुंदरता मन की.
राम के चरित में असुन्दर नहीं है कुछ.
और वह जो सुन्दर है,
वही है प्रगतिशील!
गति सँवारता है वही जीवन की.

जनवादी वैचारिकता-
बन गयी है चर्चा का विषय आज.
सिर पर उठाये फिरता है उसे,
बाम पन्थी युवा समाज.
वैसे तो जनवादी होना शुभ लक्षण है,
पर जो समझता नहीं जनवादिता का अर्थ,
राम नहीं है, वह रावण है.

राम का समूचा व्यक्तित्व है
संस्कृति का रचना बिन्दु,
और यह संस्कृति प्रकृति से जनवादी है.
रचनात्माकता इस संस्कृति की,
जनकसुता सीता हैं.
भरत और लक्ष्मण हैं
जीवन्त छाया चित्र इसके.

परिचित नहीं हैं वाम-पंथी युवा पीढ़ी,
इस संस्कृति के रसायन से.
कट-सी गयी है अपने ही घर आँगन से.
अर्थ की धुरी पर घूमती हैं आज-
भौतिक मान्यताएं.
आर्थिक नियति बन गयी है,
नियति मानव की.
बाँधे नहीं बंधती हैं आर्थिक सीमाएं.
किसको सुनाएं कथाएं आत्मगौरव की.
सुनने-सुनाने के बीच,
खाईं बहुत गहरी है.
********क्रमशः

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