Monday, December 29, 2008

ये खलिश कैसी है क्यों क़ल्ब तड़पता सा लगे.

ये खलिश कैसी है क्यों क़ल्ब तड़पता सा लगे.
सामने बैठा हुआ शख्स कुछ अपना सा लगे.
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जानता हूँ मैं कभी उससे कहीं भी न मिला,
बात फिर क्या है वो बेहद मुझे देखा सा लगे.
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सबको इस गर्दिशे-दौराँ ने किया है आजिज़,
राग वो छेड़ो जो हर एक को अच्छा सा लगे.
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मेरा हमसाया है, अब छोडो उसे माफ़ करो,
गुस्सा करते हुए भी, मुझको वो बच्चा सा लगे.
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वार करता है कुछ ऐसा कि पता तक न चले,
ज़ख्म लेकिन कहीं बेसाख्ता गहरा सा लगे.
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सबको मालूम है मासूम-तबीअत वो नहीं,
फिर भी जब सामने आए तो फ़रिश्ता सा लगे.
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ख़त्म हो जाए अगर खून के रिश्तों का लगाव,
क्यों न फिर सारा जहाँ एक ही कुनबा सा लगे.
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खलिश = चुभन, क़ल्ब = ह्रदय, शख्स = व्यक्ति, गर्दिशे-दौराँ = समय का चक्कर, आजिज़ = क्षुब्ध, हमसाया = पड़ोसी, बेसाख्ता = अनायास, मासूम-तबीअत = अबोध, भोला-भाला, कुनबा =परिवार.

4 comments:

विनय said...

बेहतरीन बहुत उम्दा!

जानता हूँ मैं कभी उससे कहीं भी न मिला,
बात फिर क्या है वो बेहद मुझे देखा सा लगे.

"अर्श" said...

हर शे'र उम्दा बहोत खूब साहब ढेरो बधाई स्वीकारें.....

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

क्या खूब लिखा है.............

Dr. Amar Jyoti said...

'सामने बैठा हुआ शख़्स…'
'सबको मालूम है…'
बहुत ख़ूब!