Thursday, December 11, 2008

मुख्यधारा से इतर जितना भी जल सागर में है.

मुख्यधारा से इतर जितना भी जल सागर में है.
वह भी सागर ही है, वह प्रत्येक पल सागर में है.
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मुख्य धारा में कभी मोती कोई मिलाता नहीं,
गहरे उतरोगे तो पाओगे वो उसके तल में है.
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गर्भ में सागर के पलते हैं कई ज्वाला मुखी,
और तूफानों का इक संसार वक्षस्थल में है.
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देखिये आकाश से धरती के रिश्तों को कभी,
ज़िन्दगी सागर की हर पानी भरे बादल में है.
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लहरें सागर की सुनामी हों तो निश्चित है विनाश,
कितने गहरे रोष की अभिव्यक्ति इस हलचल में है.
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देखना आसान है साहिल से सागर का बहाव,
साहसी है वो जो लहरों के सलिल आंचल में है.
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1 comment:

Mired Mirage said...

बहुत बढ़िया !
घुघूतीबासूती