Wednesday, December 10, 2008

दृष्टि के विस्तार की मैं ने अपेक्षा की न थी.

दृष्टि के विस्तार की मैं ने अपेक्षा की न थी.
उससे इतने प्यार की मैं ने अपेक्षा की न थी.
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मेरे मित्रों ने लगा दी आग जब घर को मेरे,
फिर किसी घर-बार की मैं ने अपेक्षा की न थी.
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अब दया करुणा की बातें हो चुकी हैं अर्थ-हीन,
तुमसे इस व्यवहार की मैं ने अपेक्षा की न थी.
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क्या परिस्थितियाँ बनीं जो मैं अकेला हो गया,
शायद इस संसार की मैं ने अपेक्षा की न थी.
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वह सलिल सा है तरल, इतना तो मैं था जानता,
स्नेहमय सत्कार की मैं ने अपेक्षा की न थी.
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मैं ही दरया, मैं ही नाविक और मैं ही नाव था,
राह में मंझधार की मैं ने अपेक्षा की न थी.
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चाहने वालों का उसके मुझको अंदाज़ा तो था,
किंतु इस भरमार की मैं ने अपेक्षा की न थी.
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2 comments:

Shashwat Shekhar said...

"जबसे फिर घर-बार की मैं ने अपेक्षा की न थी" मेरे विचार से "जबसे" की जगह "तबसे" होता तो अछा होता|

Dr. Amar Jyoti said...

शेखर जी से मैं भी सहमत हूं।
'क्या परिस्थितियाँ बनीं …'
'मैं ही दरिया…'
शानदार!