Friday, January 23, 2009

वैसे ख्वाहिश तो यही है कि बराबर आयें.

वैसे ख्वाहिश तो यही है कि बराबर आयें.
क्या ये मुमकिन है कभी आप मेरे घर आयें.
कुछ तो मालूम उन्हें भी हो कि दुनिया क्या है,
लोग खुद्साख्ता खोलों से जो बाहर आयें.
इतनी बेबाकी से हर बात कहा करते हैं आप,
सर बचा लीजिये अंदेशा है पत्थर आयें.
घर के दरवाज़े खुले रखने में खतरा है बहोत,
देखिये भूके दरिन्दे न कहीं दर आयें.
और भी लोग नुमायाँ हैं सनमखानों में,
क्या ज़रूरी है सब इल्ज़ाम मेरे सर आयें.
बे-अदब के लिए मम्नूअ है तहसीले-अदब,
इल्म का शह्र है, दरवाज़े में झुक कर आयें.
शैतनत मिट नहीं सकती है ज़माने से कभी,
ख्वाह दुनिया में कई लाख पयम्बर आयें.
खैरो-शर दोनों बहरहाल रहेंगे मौजूद,
सूइयां ज़ह्न की, कब, किसकी, कहाँ पर आयें.
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3 comments:

MANVINDER BHIMBER said...

इल्म का शह्र है, दरवाज़े में झुक कर आयें.
शैतनत मिट नहीं सकती है ज़माने से कभी,
ख्वाह दुनिया में कई लाख पयम्बर आयें.
खैरो-शर दोनों बहरहाल रहेंगे मौजूद,
सूइयां ज़ह्न की, कब, किसकी, कहाँ पर आयें.
बहुत खूबसूरत अंदाज है

"अर्श" said...

HAMESHA KI TARAH FIR SE BADHIYA GAZAL ..DHERO BADHAI AAPKO



ARSH

Dr. Amar Jyoti said...

'कुछ तो मालूम उन्हें भी…'
'और भी लोग नुमायाँ हैं…'
'बेअदब के लिये…'एक से बढ़ कर एक।
बहुत ख़ूब!