Thursday, January 15, 2009

समन्दरों ने कहा सब हवाएं बांधते हैं.

समन्दरों ने कहा सब हवाएं बांधते हैं.
उडानें भर के मधुर कल्पनाएँ बांधते हैं.
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यथार्थ से हैं बहुत दूर इस शहर के लोग,
जो बंध न पायीं कभी वो सदाएं बांधते हैं.
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तमाम लोगों में है आत्मीयता का अभाव,
दया की डोर से संवेदनाएं बांधते हैं.
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कहीं भी ठोस धरातल नहीं विचारों का,
नए सिरे से नई श्रृंखलाएं बांधते हैं.
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सुखाते रहते हैं धो-धो के अपने आश्वासन,
वो अलगनी की तरह योजनाएं बांधते हैं.
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निगाहें डालते हैं कसमसाती बेलों पर,
नितांत छद्म से नाज़ुक लताएं बांधते हैं.
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ये मूर्तियाँ हमें मजबूर तो नहीं करतीं,
हम इनके साथ स्वयं आस्थाएं बांधते हैं.
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विचित्र होते हैं ये दाम्पत्य के रिश्ते,
ये गाँठ वो है कि देकर दुआएं बांधते हैं.
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4 comments:

Dr. Amar Jyoti said...

'सुखाते रहते हैं…'
बहुत सुन्दर। बिलकुल नई उपमा।

"अर्श" said...

bahot khub likha hai aapne...dhero badhai aapko.....



arsh

गौतम राजरिशी said...

"सुखाते रहते हैं धो-धो के अपने आश्वासन" क्या मिस्‍रा है

सुंदर काफ़ियें सर...सलाम

संजीव तिवारी said...

सापेक्ष के सपने सच होनें लगे हैं