Wednesday, January 28, 2009

कुछ तो हँसी-मजाक करें तितलियों के साथ.

कुछ तो हँसी-मजाक करें तितलियों के साथ.
पूछें कभी कि रिश्ते हैं क्या-क्या गुलों के साथ.
हैरत ये है कि सीता-स्वयम्बर के जश्न में,
आये हुए हैं राम-लखन नावकों के साथ.
मजरूह उस से कोई किसी पल न हो कभी,
करते हैं जो सुलूक भी हम दूसरों के साथ.
कितने ही लोग भीष्म पितामह हैं आज भी,
दिल पांडवों के साथ है, जाँ कौरवों के साथ.
माँ-बाप का ख़याल भी है, अपनी फ़िक्र भी,
उलझन अजीब तर्ह की है दो दिलों के साथ.
मक़्तल की सिम्त जाने लगा जब वो शहसवार,
घोड़ा बढ़ा न, बेटी थी लिपटी सुमों के साथ.
खुलते ही काँप जाते हैं बेसाख्ता ये क्यों,
क्या हादसा हुआ है तुम्हारे लबों के साथ.
अब शायरों का ज़ाहिरो-बातिन नहीं है एक,
शिकवा है मुफलिसी का, हैं सौदागरों के साथ.
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3 comments:

Dr. Amar Jyoti said...

'कितने ही लोग…'
'अब शायरों का…'
बहुत ख़ूब!बेहतरीन!

"अर्श" said...

बहोत ही बढ़िया लिखा है आपने ... ढेरो बधाई...आपको..

अर्श

अशोक मधुप said...

खुलते ही काँप जाते हैं बेसाख्ता ये क्यों,
क्या हादसा हुआ है तुम्हारे लबों के साथ.

बहुत शानदार गजल। बधाई।